अब जमानत मामलों में नहीं चलेगी ‘तारीख पर तारीख’, दो महीने में फैसला करने का निर्देश; पटना हाई कोर्ट ने जारी की एसओपी
पटना हाई कोर्ट ने जमानत मामलों में तेजी लाने के लिए नई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की है, जिसके ...और पढ़ें

अनावश्यक स्थगन पर रोक
HighLights
जमानत याचिकाओं का निपटारा दो महीने में अनिवार्य।
अनावश्यक स्थगन पर रोक, देरी का कारण दर्ज होगा।
केस डायरी, रिपोर्ट पांच दिनों में उपलब्ध करानी होगी।
विधि संवाददाता, पटना। जमानत मामलों में देरी खत्म करने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पटना हाई कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। हाई कोर्ट ने बिहार की सभी अधीनस्थ अदालतों के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की है। इसके तहत जमानत और अग्रिम जमानत याचिकाओं का त्वरित निष्पादन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
एसओपी के अनुसार, जमानत याचिकाओं का दाखिल होने की तारीख से यथासंभव दो महीने के भीतर निपटारा करना होगा। पक्षकारों के कारण होने वाली देरी को इसका अपवाद माना गया है। यह पहल सुप्रीम कोर्ट के 12 सितंबर 2025 के फैसले के अनुपालन में की गई है।
अनावश्यक स्थगन पर रोक, देरी का कारण बताना होगा
एसओपी में सुनवाई के दौरान अनावश्यक स्थगन यानी तारीख बढ़ाने पर रोक लगाई गई है। केवल अधिवक्ताओं के अनुरोध पर मामलों को नहीं टाला जाएगा।
असाधारण परिस्थितियों में ही अदालत अगली तारीख तय कर सकेगी। ऐसी स्थिति में पीठासीन अधिकारी को आदेश में स्थगन का ठोस कारण दर्ज करना होगा।
यदि कोई जमानत याचिका दो महीने से अधिक समय तक लंबित रहती है, तो संबंधित न्यायाधीश को आदेश पत्र में देरी का स्पष्ट कारण बताना अनिवार्य होगा। इसका उद्देश्य लंबित मामलों की निगरानी बढ़ाना और समय पर सुनवाई सुनिश्चित करना है।
केस डायरी और जरूरी रिपोर्ट पांच दिनों में देनी होगी
एसओपी के तहत जमानत याचिका दाखिल करने से पहले उसकी एक प्रति संबंधित लोक अभियोजक या जिला अभियोजन अधिकारी को देनी होगी। इससे केस डायरी मंगाने की प्रक्रिया पहले ही शुरू की जा सकेगी।
जख्म रिपोर्ट (इंजरी रिपोर्ट), पोस्टमार्टम रिपोर्ट, एफएसएल रिपोर्ट और केस डायरी अदालत को पांच दिनों के भीतर उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है।
समय बचाने के लिए केस डायरी की स्कैन प्रति व्हाट्सऐप या ईमेल से भेजने और डिजिटल रूप में पेश करने की व्यवस्था भी की गई है।
पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही होगी तय
पुलिस और अभियोजन के बीच समन्वय बेहतर बनाने के लिए डीएसपी स्तर के नोडल अधिकारी की जिम्मेदारी तय की गई है। समय पर जरूरी रिपोर्ट और दस्तावेज पेश नहीं करने वाले अधिकारियों के खिलाफ अदालत कठोर कार्रवाई कर सकती है। इससे जमानत मामलों में पुलिस की ओर से होने वाली देरी पर अंकुश लगाने की कोशिश की गई है।
लंबित जमानत याचिकाओं की होगी नियमित निगरानी
मामलों की नियमित ट्रैकिंग के लिए हाईकोर्ट और जिला स्तर पर समर्पित डैशबोर्ड बनाने का सुझाव दिया गया है। इसमें लंबित याचिकाओं को 30 दिन, 31 से 60 दिन, 61 से 90 दिन और 90 दिन से अधिक की श्रेणियों में बांटा जाएगा।
60 दिन से अधिक पुरानी या दो महीने की समयसीमा के करीब पहुंच चुकी याचिकाओं को प्राथमिकता से दिखाने के लिए लाल निशान से चिह्नित किया जाएगा।
इसके अलावा, सभी अदालतों को जमानत मामलों का मासिक विवरण संबंधित जिला एवं सत्र न्यायाधीश को भेजना होगा। इन उपायों का उद्देश्य जमानत याचिकाओं के निपटारे में तेजी लाना और लंबित मामलों पर जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
