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20 साल बाद पलटा फैसला, पटना हाईकोर्ट ने सभी अभियुक्तों को ठहराया दोषी; मुख्य आरोपी को सात वर्ष की सजा

Published: Mon, 27 Jul 2026 06:15 PM (IST)

पटना हाईकोर्ट ने 2006 के भागलपुर जगदीशपुर गोलीकांड में ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए सभी अभियुक्तों को दोषी ठहराया है।

पटना हाईकोर्ट

पटना हाईकोर्ट

HighLights

  1. पटना हाईकोर्ट ने 2006 गोलीकांड में सभी अभियुक्तों को दोषी ठहराया।

  2. ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटा, घायल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही मानी विश्वसनीय।

  3. मुख्य आरोपी को सात साल की सजा, अन्य को भी कारावास।

विधि संवाददाता, पटना। पटना हाईकोर्ट ने भागलपुर जिले के जगदीशपुर थाना क्षेत्र में वर्ष 2006 में हुए चर्चित गोलीकांड के मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए सभी अभियुक्तों को दोषी करार दिया है।

न्यायमूर्ति बिबेक चौधरी एवं न्यायमूर्ति राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने घायल प्रत्यक्षदर्शी की विश्वसनीय गवाही और चिकित्सीय साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया। इसके कारण अभियुक्तों को गलत तरीके से संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया गया था।

2006 में मजार की जमीन पर स्कूल निर्माण को लेकर विवाद

मामला 18 नवंबर 2006 का है। अभियोजन के अनुसार, भागलपुर के खिरीबांध गांव स्थित मजार की भूमि पर विद्यालय निर्माण को लेकर दो पक्षों के बीच विवाद हुआ था।

आरोप है कि विरोध के दौरान चांद आलम उर्फ मनु ने घायल सम्स तबरेज को पकड़कर जमीन पर गिरा दिया।

इसके बाद शमशेर उर्फ सम्सुल मिस्त्री को गोली चलाने का आदेश दिया गया। गोली सम्स तबरेज की पीठ में लगी, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया था।

2018 में ट्रायल कोर्ट ने दिया था सभी को बरी करने का फैसला

घटना के बाद जगदीशपुर थाना कांड संख्या 274/2006 दर्ज किया गया था। मामले की सुनवाई के बाद सत्र न्यायालय, भागलपुर ने 11 जनवरी 2018 को सभी अभियुक्तों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था।

इस फैसले के खिलाफ पीड़ित पक्ष ने पटना हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की थी। करीब दो दशक पुराने इस मामले में अब हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया है।

घायल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही को हाईकोर्ट ने माना विश्वसनीय

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि घायल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही को कानून में विशेष महत्व प्राप्त है। यदि उसकी गवाही विश्वसनीय हो और चिकित्सीय साक्ष्यों से पुष्ट होती हो तो केवल इस आधार पर उसे खारिज नहीं किया जा सकता कि वह पीड़ित पक्ष का रिश्तेदार है।

अदालत ने पाया कि घायल सम्स तबरेज की गवाही एफआईआर से लेकर मुकदमे की पूरी कार्यवाही के दौरान एक समान रही।

चिकित्सीय साक्ष्य से भी हुई गोली लगने की पुष्टि

खंडपीठ ने कहा कि डॉक्टर की रिपोर्ट में भी निकट दूरी से गोली लगने की पुष्टि हुई है। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विवेचना में कुछ कमियां, जैसे गोली या हथियार की बरामदगी नहीं होना अथवा कुछ पुलिस अधिकारियों का गवाही के लिए पेश नहीं होना, अपने आप में अभियोजन के पूरे मामले को अविश्वसनीय नहीं बनाता।

यदि प्रत्यक्षदर्शी की गवाही और चिकित्सीय साक्ष्य भरोसेमंद हों तो केवल जांच की कमियों के आधार पर अभियुक्तों को बरी नहीं किया जा सकता।

मुख्य आरोपी को सात साल की सजा

हाईकोर्ट ने शमशेर उर्फ सम्सुल मिस्त्री को भारतीय दंड संहिता की धारा 307 और शस्त्र अधिनियम की धारा 27 समेत अन्य धाराओं में दोषी ठहराते हुए सात वर्ष के सश्रम कारावास, तीन वर्ष के अतिरिक्त कारावास और 25 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।

वहीं चांद आलम उर्फ मनु सहित अन्य अभियुक्तों को धारा 307/149, 324/149 और 147/148 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया गया।

उन्हें पांच वर्ष तक के सश्रम कारावास और 15-15 हजार रुपये जुर्माने की सजा दी गई। सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी।

चार सप्ताह में आत्मसमर्पण का आदेश, नहीं तो होगी गिरफ्तारी

अदालत ने सभी दोषियों को चार सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि निर्धारित अवधि में आत्मसमर्पण नहीं करने पर उनकी गिरफ्तारी की कार्रवाई की जाएगी।

करीब 20 वर्ष पुराने इस मामले में हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब सभी दोषियों को सजा भुगतने के लिए तय समय सीमा के भीतर अदालत के समक्ष पेश होना होगा।