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14 अफसरों के भरोसे 7 हजार साइबर केस, पटना में एक इंस्पेक्टर पर 500 मुकदमों का बोझ; कैसे मिलेगी पीड़ितों को जल्द राहत?

Published: Mon, 28 Sep 2026 08:10 PM (IST)

पटना साइबर थाने में 7,000 साइबर मामले लंबित हैं, जिनकी जांच के लिए केवल 14 अधिकारी उपलब्ध हैं, जिससे प्रत्येक अधिकारी पर औसतन 500 केस का भारी बोझ है।

जांच अधिकारियों की संख्या नहीं बढ़ी

जांच अधिकारियों की संख्या नहीं बढ़ी

HighLights

  1. पटना साइबर थाने में 7,000 मामले लंबित, 14 अधिकारी।

  2. प्रत्येक अधिकारी पर औसतन 500 केस का भारी बोझ।

  3. जांच में देरी से तकनीकी साक्ष्य जुटाना मुश्किल।

शुभम कुमार, पटना। पटना साइबर थाने में साइबर अपराध के बढ़ते मामलों के बीच जांच व्यवस्था पर काम का भारी दबाव है। थाने में करीब 7,000 मामले लंबित हैं, जबकि अनुसंधान की जिम्मेदारी महज 14 इंस्पेक्टर और सब-इंस्पेक्टर संभाल रहे हैं। ऐसे में एक जांच अधिकारी के हिस्से औसतन 500 लंबित केस आ रहे हैं।

मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2023 में नौ जून के बाद 737 केस दर्ज हुए थे। 2024 में यह संख्या बढ़कर 2,582 हो गई। वर्ष 2025 में 15 दिसंबर तक 2,472 मामले दर्ज हो चुके थे। वर्ष 2026 में रोजाना करीब 20 से 25 नए मामले दर्ज होने की बात सामने आई है।

केस बढ़ते गए, जांच अधिकारियों की संख्या नहीं बढ़ी

फिलहाल पटना साइबर थाने की कमान डीएसपी संगीता और डीएसपी नवल किशोर के पास है। अनुसंधान के लिए 14 इंस्पेक्टर और सब-इंस्पेक्टर तैनात हैं। इनमें इंस्पेक्टर के पास औसतन 400 और सब-इंस्पेक्टर के पास करीब 250 केस लंबित बताए जा रहे हैं।

सब-इंस्पेक्टरों को 100 से 150 सनहा की जांच का जिम्मा भी संभालना पड़ रहा है। इतने बड़े वर्कलोड के कारण पुराने मामलों की जांच के साथ नए मामलों पर भी तेजी से काम करना चुनौती बन गया है।

IT Act के मामलों में भी बदलनी पड़ रही धाराएं?

पुलिस सूत्रों के मुताबिक आइटी एक्ट से जुड़े मामलों का अनुसंधान इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी द्वारा किया जाना चाहिए। लेकिन इंस्पेक्टरों पर अत्यधिक बोझ के कारण कुछ मामलों में धोखाधड़ी से जुड़ी धाराएं लगाकर उन्हें सब-इंस्पेक्टर स्तर पर जांच के लिए सौंपने की स्थिति बन रही है।

इसका असर जांच की प्राथमिकताओं पर भी पड़ने की बात सामने आ रही है। साइबर अपराध के पूरे नेटवर्क और गिरोह तक पहुंचने के बजाय कई मामलों में ठगी की रकम को होल्ड कराने और पीड़ितों को पैसा वापस दिलाने पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करना पड़ रहा है।

40 से 50 अतिरिक्त अफसरों की जरूरत

सूत्रों के अनुसार साइबर थाने में पुलिस पदाधिकारियों और बल की कमी को लेकर वरीय अधिकारियों को पत्र भेजकर जानकारी दी गई है। थाने के सुचारू संचालन और मामलों की गुणवत्तापूर्ण जांच के लिए तत्काल 40 से 50 अतिरिक्त पुलिस पदाधिकारियों की जरूरत बताई गई है।

मौजूदा मैनपावर के मुकाबले मामलों की संख्या लगातार बढ़ने से जांच अधिकारियों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। ऐसे में अतिरिक्त बल की तैनाती को साइबर मामलों के तेजी से निपटारे के लिए जरूरी माना जा रहा है।

देरी से तकनीकी सबूत जुटाना भी मुश्किल

साइबर मामलों की जांच में देरी का असर तकनीकी साक्ष्यों पर भी पड़ सकता है। आइपी एड्रेस, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, टावर लोकेशन और सर्वर लॉग जैसे डेटा को लंबे समय बाद हासिल करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

कई टेलीकॉम और इंटरनेट सेवा प्रदाता तय अवधि के बाद डेटा हटा देते हैं। ऐसे में जांच में देरी होने पर महत्वपूर्ण तकनीकी साक्ष्य जुटाना मुश्किल हो सकता है।

दूसरे राज्यों के गिरोह तक पहुंचना चुनौती

साइबर अपराध से जुड़े कई गिरोह दूसरे राज्यों से संचालित होने की बात सामने आती है। झारखंड, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों तक जांच के लिए टीम भेजना भी अतिरिक्त संसाधन मांगता है।

स्थानीय स्तर पर अधिकारियों की कमी होने से अंतरराज्यीय कार्रवाई में देरी की स्थिति बन सकती है। इससे साइबर अपराधियों के नेटवर्क तक समय पर पहुंचना मुश्किल हो जाता है।

म्यूल अकाउंट और फर्जी सिम से बढ़ती मुश्किल

साइबर ठगी की रकम अक्सर कई बैंक खातों में तेजी से ट्रांसफर की जाती है। इन म्यूल अकाउंट की श्रृंखला को ट्रैक कर अंतिम लाभार्थी तक पहुंचना जांच अधिकारियों के लिए चुनौतीपूर्ण होता है।

इसके अलावा फर्जी दस्तावेजों पर लिए गए सिम और डिजिटल वालेट का इस्तेमाल भी जांच को पेचीदा बनाता है। अत्यधिक मामलों के बीच इन तकनीकी कड़ियों को जोड़ना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

कमजोर जांच का असर अदालत में भी पड़ सकता है

लगातार बढ़ते वर्कलोड का असर गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान पर पड़ने की आशंका है। वैज्ञानिक साक्ष्यों का विस्तृत विश्लेषण और आरोपपत्र तैयार करने के लिए पर्याप्त समय और संसाधन की जरूरत होती है।

जांच में खामियां रहने पर अदालत में आरोपपत्र कमजोर पड़ सकता है। ऐसे में पटना साइबर थाने के सामने बढ़ते मामलों के साथ-साथ पर्याप्त अनुसंधानकर्ताओं की तैनाती और तकनीकी संसाधन मजबूत करना भी बड़ी चुनौती बन गया है।