पटना [सुभाष पांडेय]। भाजपा के लिए सहयोगियों के साथ सीटों का तालमेल करना आसान नहीं होगा। गत लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के साथ उसे सीट बंटवारे में कोई खास परेशानी नहीं हुई थी, लेकिन इस बार प्रमुख सहयोगी जदयू की अपेक्षाओं और रालोसपा के आक्रामक तेवर के चलते उसके लिए रास्ता आसान नहीं दिख रहा है।
2014 में इसलिए नहीं हुई परेशानी
2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा को लोजपा के राम विलास पासवान और रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा के साथ सीट बंटवारा में इसलिए भी परेशानी नहीं हुई, क्योंकि तब दोनों के पास लोकसभा की कोई सीटिंग सीट नहीं थी। पासवान खुद 2009 का लोकसभा चुनाव हार कर लालू यादव की मदद से राज्यसभा पहुंचे थे। कुशवाहा भी नीतीश कुमार की इच्छा से राज्यसभा गए थे। यह अलग बात है कि लोकसभा चुनाव से पहले ही उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता त्याग कर नई पार्टी बना ली थी।
इस बार अलग हैं हालात
इस बार के हालात अलग हैं। नरेंद्र मोदी लहर पर सवार होकर ही सही दोनों दलों के पास क्रमश: लोकसभा की छह और तीन सीटें हैं। स्वाभाविक है कि इसी के बल पर इनकी अपनी-अपनी दावेदारी है। इधर गठबंधन (राजग) में बड़े सहयोगी के तौर पर जदयू शामिल हो गया है। ऐसे में सबकी सीटों में से ही काट छांट कर जदयू की दावेदारी को भी समायोजित करना है।
बिहार में जदयू सबसे बड़ा सहयोगी
बिहार में चल रही राजग की सरकार में 70 विधायकों के साथ सबसे बड़ा सहयोगी जदयू है। 2004 और 2009 का लोकसभा चुनाव भी उसने भाजपा से तालमेल करके ही लड़ा था। तब उनकी हैसियत बिहार में बड़े भाई के रूप में थी। 2014 का चुनाव वह राजग से अलग होकर लड़ा, लेकिन उसे दो सीटों पर ही कामयाबी मिल पाई। महज इस आधार पर इस बार उसकी दावेदारी कम नहीं हो जाती है।
जदयू चाहता बराबरी
बदले हालात में जदयू भले ही भाजपा से अधिक सीटों पर लडऩे की मांग करने की स्थिति में न हो लेकिन वह बराबरी अवश्य चाहता है। सूत्रों का कहना है जदयू चाहता है कि दोनों को 16-16 सीटें मिले। शेष आठ सीटें लोजपा, रालोसपा व अन्य को दी जाएं। शरद यादव के खिलाफ राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव के लिए राजग को एक सीट छोडऩी पड़े तो उसके लिए भी गुरेज नहीं।
भाजपा के साथ परेशानी
सबसे बड़ी दिक्कत भाजपा के साथ है। पिछले चुनाव में वह 30 सीटों पर लड़ी थी। 22 उसकी सीटिंग सीटें हैं। बांका, पूर्णिया और भागलपुर जैसी कुछ सीटें कम वोट से हारी थी। ऐसे में जदयू के लिए सीट छोडऩे का सर्वाधिक त्याग उसे ही करना होगा। लोजपा को खास परेशानी नहीं है। जिन सात सीटों पर वह लड़ी थी, उसमें छह पर जीते सांसदों में दो अबकी उसके सिंबल पर नहीं लडऩा चाहते। पार्टी जिस एकमात्र नालंदा सीट पर चुनाव हारी उसपर जदयू का कब्जा है।
भाजपा के लिए सबसे ज्यादा परेशानी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ कुशवाहा के आक्रामक तेवर को लेकर है। बिहार में लोकसभा का चुनाव नीतीश के नेतृत्व में ही लड़ा जाना है। ऐसे में सीटों का तालमेल अगर हो भी जाए तो इन दोनों को एकजुट कर चुनावी मैदान में उतरना आसान का नहीं है।

Posted By: Amit Alok