पटना, अरुण अशेष। लोकसभा चुनाव के समय नेताओं की इस दल से उस दल में उछल-कूद लगी रहती है। टिकट के चक्कर में इधर से उधर दामन थामने लगते हैं। लेकिन बिहार में बीते लोकसभा चुनाव में उछल-कूद करने वाले पांव इस बार थमे से हैं। बड़े दलों में पांव रखने की जगह नहीं है। ले देकर कांग्रेस का आंगन है, जिसमें हर किसी के लिए जगह है। हालांकि वहां भी कहा जा रहा है कि पार्टी में सबका स्वागत है लेकिन सीटों की उम्मीद मन में न ही रखें। बाकी सीटों की कमी की समस्या से बीजेपी, जदयू, राजद, लोजपा, रालोसपा सभी जूझ रही हैं। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में हो रही चर्चा की मानें तो गोटी सेटर इस बार परेशान हैं।  

हाल कांग्रेस का

बिहार में कांग्रेस पर नजर डालें तो पार्टी को 12 सीटें मिली थीं। तीन उम्मीदवार बाहर से लेने पड़े थे। तीन राज्यों में जीत के बाद कांग्रेसी जोश में हैं। वे दबी जुबान से कह रहे हैं-पार्टी को सभी सीटों पर लड़ना चाहिए। इतना ही नहीं, कुछ नेता तो यहां तक कहना शुरू कर दिए हैं कि पार्टी को फ्रंट लाइन पर आना चाहिए। 

RJD में नए लोगों की गुंजाइश नहीं

राजद में नए लोगों की गुंजाइश नहीं है। आगंतुकों को कहा जा रहा है-स्वागत है। कृपया टिकट की मांग न करें। पिछली बार राजद 27 सीटों पर लड़ा था। इनमें पांच पहली बार लड़े थे। तीन बाहर के थे। संयोग से बाहर वाले तीनों-श्रीभगवान सिंह कुशवाहा, पप्पू यादव और प्रगति मेहता दल में रह नहीं गए हैं। सीटें 27 से कम भी हो सकती हैं। ऐसे में राजद को बाहरी उम्मीदवार नहीं चाहिए।

JDU में बाहरी के लिए कम जगह

जदयू 38 के बदले इस बार 17 सीटों पर लड़ेगा। बाहरी के लिए कम जगह है। हां, सत्तारूढ़ दल होने के कारण जदयू में लोकसभा के अलावा अन्य जगहों पर भी समायोजन की गुंजाइश है। राज्यसभा, विधान परिषद, अगला विधानसभा चुनाव और सरकार के निगम और बोर्ड। लिहाजा, आशावादी लोग जदयू का रूख कर रहे हैं। चुनिन्दा सीटों के लिए उम्मीदवार की भी खोज है। पुराने कांग्रेसी प्रो. रामजतन सिन्हा इसी खोज की देन हैं। उन्हें जहानाबाद से उम्मीदवार बनाया जा सकता है।

तब BJP में थे आठ बाहरी

2014 में 30 सीटों के लिए भाजपा को आठ उम्मीदवारों का आयात करना पड़ा था। सीन बदल गया है। अब 17 सीटों पर लड़ने जा रही भाजपा के सामने अपनों के समायोजन का संकट है। क्षेत्र में लोकप्रिय नहीं रह गए सांसदों की जगह भाजपा कुछ नए चेहरों को मैदान में उतार सकती है। ये दल के ही चेहरे होंगे। इसका असर भी दिख रहा है। भाजपा के दरवाजे पर नए जाने-पहचाने चेहरे कम नजर आ रहे हैं। 

यहां भीड़ अधिक, सीटें कम 

लोजपा-रालोसपा-हम जैसे दलों में भी बड़ी संख्या में बाहरी उम्मीदवारों को खपाने का दम नहीं है। लोजपा में एकाध उम्मीदवार की गुंजाइश है। भीड़ अधिक है। आने की शर्त टिकट की गारंटी है। सो, कतार लंबी नहीं है। हम खुद अपनों को टिकट दिलाने के लिए परेशान है। रालोसपा की भी यही दशा है।

Posted By: Rajesh Thakur

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