- 2011 के बाद पटना नगर निगम क्षेत्र में किसी ने नहीं लिया लाइसेंस

- तत्कालीन डिप्टी मेयर ने ही बस अपने कुत्ते के लिए लिया था लाइसेंस

- पालने के लिए निगम को देनी पड़ती है 100 रुपये लाइसेंस फीस

- अगर निगम नियम सख्ती से लागू हो तो एक साल में हो लाखों की आमदनी

- पालतू हों या आवारा, कुत्तों पर नियंत्रण में निगम नकारा

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नलिनी रंजन, पटना : चाहे शहर में पालतू कुत्तों की संख्या की जानकारी की बात हो या फिर आवारा कुत्तों पर नियंत्रण का मामला, पटना नगर निगम दोनों ही परिस्थितियों में नकारा साबित हो रहा है।

पालतू कुत्तों से ही शुरुआत करते हैं। निगम क्षेत्र में कुत्ता पालने के लिए लाइसेंस लेना जरूरी है। इसके लिए 100 रुपये फीस है। मगर वर्तमान में किसी ने कुत्ता पालने के लिए लाइसेंस नहीं ले रखा है। निगम के तत्कालीन उप महापौर संतोष मेहता ही एकमात्र शहरवासी थे, जिन्होंने अपने कुत्ते के लिए लाइसेंस लिया था। लेकिन 2011 में उनकेकुत्ते की मौत के बाद अबतक किसी ने लाइसेंस नहीं लिया है।

सुबह टहलने निकलें तो अपने कुत्तों के साथ टहलते एवं उनकी नित्यक्रिया के लिए कोने तलाशते लोग सभी को नजर आ जाएंगे। राजधानी की पॉश कॉलोनियों के साथ ही अन्य आवासीय कॉलोनियों एवं मोहल्लों में कई घरों के गेट पर 'कुत्ते से सावधान' का बोर्ड तो सभी को नजर आ जाएगा। शायद ही किसी को इस बात से इनकार होगा कि राजधानी में कुत्ता पालने वालों की संख्या हजारों में होगी। मगर बस निगम को यह नजर नहीं आता है। निगम लाइसेंस के अपने नियम को सख्ती से लागू करे तो उसे प्रतिवर्ष लाखों की आय हो जाए।

आवारा कुत्तों की बात करें तो उनके नियंत्रण को लेकर भी स्थिति काफी दयनीय है। आवारा कुत्तों ने राजधानी में आतंक मचा रखा है। कहर ऐसा कि बीते साल से लेकर नए साल के दूसरे महीने तक 5 हजार लोगों को काटकर अपना शिकार बना चुके हैं। रात में तो ये और भी खूंखार हो जाते हैं। खाली सड़कों पर तो मानों इनका साम्राज्य कायम हो जाता है। दोपहिया एवं कार चालकों से तो मानों इन्हें विशेष चिढ़ होती है। खाली सड़क पर बगल से गुजरने के क्रम में कब दौड़ा लें, पता नहीं।

: हर दिन अस्पताल पहुंच रहे जख्मी :

कुत्ते के काटने के शिकार लोग सुई के लिए लगभग हर दिन अस्पताल में चक्कर लगाते दिख जाते हैं। कभी दवा मिल जाती है तो कभी मरीजों को भटकना पड़ता है। कुत्तों के आतंक से निजात दिलाने के लिए नगर निगम के स्तर से कोई खास पहल नहीं हो रही है। निगम आवारा कुत्तों की नसबंदी में फिसड्डी साबित हो रहा है।

: काटने के शिकार हो रहे हैं लोग :

आंकड़े के अनुसार केवल पीएमसीएच में 2017 से अब तक पांच हजार से अधिक लोग कुत्ते के काटने के शिकार होकर एआरवी के लिए पहुंचे। जबकि विभिन्न पीएचसी में भी करीब पांच हजार लोगों ने एआरवी वैक्सीन ली। वहीं एनएमसीएच में भी यह आंकड़ा तीन हजार के करीब है। शेष लोगों ने निजी सेंटरों से सुई लेकर अपना इलाज कराया। कुत्ता काटने पर एक व्यक्ति को तीन बार सुई लेनी पड़ती है।

नियंत्रण के लिए कोई उपाय नहीं :

आवारा पशु से लेकर कुत्तों पर नियंत्रण के लिए शहरवासी लगातार आवाज उठा रहे हैं। पटना नगर निगम प्रशासन के पास कुत्तों को पकड़ने के लिए कोई योजना नहीं है। मेयर सीता साहू ने बताया कि आवारा कुत्तों पर नियंत्रण के लिए बेउर में अस्पताल का निर्माण कार्य चल रहा है। इसके वर्ष के अंत तक तैयार होने की संभावना है।

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जुर्माना वसूली में भी फिसड्डी

बिहार नगरपालिका अधिनियम में आवारा पशुओं को पकड़ने का प्रावधान बनाया गया है। यहीं नहीं पालतू कुत्ते के लाइसेंस नहीं लेने पर जुर्माने का प्रावधान किया गया है। लेकिन निगम प्रशासन यह कार्रवाई नहीं करता।

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: होगी जांच, चलेगा अभियान :

आवारा कुत्तों को लेकर बेउर में अस्पताल का निर्माण हो रहा है। नसबंदी के माध्यम से इन पर नियंत्रण किया जाएगा। जबकि पालतू कुत्तों के लाइसेंस के लिए निगम समीक्षा करेगा। इसके बाद अभियान चलाकर जुर्माना वसूलने की कार्रवाई करेगी।

- केशव रंजन प्रसाद, नगर आयुक्त।

Posted By: Jagran

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