मखाना मुखर, मशरूम मौन; बिहार में 11 साल में 0.06 से 42.19 हजार टन पहुंचा उत्पादन, अब इनडोर खेती की क्रांति
बिहार में मखाना और मशरूम दोनों के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जहाँ मशरूम उत्पादन 11 वर्षों में 0.06 हजार टन से बढ़कर 42.19 हजार टन हो गया है।

मशरूम से बढ़ रही बिहार के लोगों की कमाई। सांकेतिक तस्वीर
HighLights
बिहार में मशरूम उत्पादन 11 साल में 0.06 से 42.19 हजार टन।
मशरूम 'इनडोर कृषि क्रांति' का नेतृत्व, गरीबी उन्मूलन में सहायक।
मखाना वैश्विक ब्रांडिंग कर रहा, मशरूम माइक्रो-इकोनॉमिक गेमचेंजर।
विकाश चन्द्र पाण्डेय, पटना। बिहार इन दोनों के उत्पादन में देश में अग्रणी है, लेकिन मखाना मुखर है और मशरूम मौन। इसीलिए मशरूम की बातें तनिक कम सुनी जा रहीं।
हालांकि, इसके भरोसे निम्न आय वर्ग वाले लोगों की कमाई दिन-प्रति-दिन बढ़ती जा रही। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की ताजा रिपोर्ट बता रही कि वर्ष 2013-14 में बिहार में मात्र 0.06 हजार टन मशरूम होता था, जो बढ़कर अब 42.19 हजार टन हो चुका है।
12.84% की दर से बढ़ेगा मशरूम का बाजार
इसके उत्पादन में अभी आगे भी जोरदार वृद्धि की संभावना है, जबकि मखाना उत्पादन के उच्चतम स्तर को छूने लगा है। हालांकि, 2030 तक मखाने का रकबा 70000 हेक्टेयर तक बढ़ाने का लक्ष्य है।
कृषि-अर्थव्यवस्था में मखाना वस्तुत: 'मैक्रो-इकोनमिक सुपरफूड' है, जो वैश्विक स्तर पर बिहार की ब्रांडिंग कर रहा और विदेशी मुद्रा जुटा रहा है।
इसके विपरीत, मशरूम एक 'माइक्रो-इकोनमिक गेमचेंजर' है, जो गरीबी उन्मूलन, पोषण सुरक्षा और महिला सशक्तीकरण का प्रभावी और कम लागत वाला जरिया सिद्ध हो रहा है।
मशरूम उत्पादन में 2022 में अग्रणी बना था बिहार
इन दोनों उत्पादों के साथ एक संयोग वर्ष 2022 से जुड़ा है। उस वर्ष दूसरे राज्यों को पीछे छोड़ते हुए बिहार मशरूम के उत्पादन में अग्रणी राज्य बना। तब से वह पहले क्रमांक पर कायम है।
मिथिला मखाने को भौगोलिक प्रतिदर्श-चिह्न (जीआइ टैग) भी उसी वर्ष मिला। उसके बाद निर्यात की संभावना में आशातीत वृद्धि हुई। हालांकि, सर्वाधिक खपत आज भी घरेलू स्तर पर ही है।
मखाना का उत्पादन मुख्य रूप से तालाबों और जलजमाव वाले क्षेत्रों तक सीमित है। इसके उत्पादन में अत्यधिक श्रम और लागत की आवश्यकता होती है और इसमेंं समुदाय विशेष के लोग दक्ष हैं।
मशरूम के लिए उपजाऊ भूमि या विशेष मौसम की आवश्यकता नहीं होती। बेहद कम लागत (भूसा, कंपोस्ट और स्पान के जरिये) से इसे झोपड़ियों या बंद कमरों में रैक बनाकर उगाया जाता है।
बहरहाल यह राज्य में एक नई ''इनडोर कृषि क्रांति'' का नेतृत्व कर रहा है। यदि प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और मार्केट लिंकेज बेहतर हो, तो बिहार की अर्थव्यवस्था मेंं इसका महत्वपूर्ण योगदान होगा।
उत्पादन और निर्यात : विश्व में 80% मखाना भारत में होता है और भारत का 80% बिहार में। मखाने के कुल निर्यात में बिहार की हिस्सेदारी भी लगभग इतनी ही है।
मशरूम के वैश्विक उत्पादन में भारत चौथे स्थान पर है। हालांकि, निर्यात अभी मामूली है, लेकिन कुल उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी अभी 12.02% है, जो 2020 में 10.82% हुआ करती थी।
बाजार और अनुमान : मार्केट एंड रिसर्च के अनुसार, भारत में मखाना का बाजार 2025 में 92900 करोड़ रुपये था। 8.85% की चक्रवृद्धि दर से बढ़कर 2034 तक यह 19950 करोड़ रुपये का होगा।
मशरूम का बाजार 2024 में लगभग 11992 करोड़ रुपये का था। 2030 तक यह बढ़कर 24753 करोड़ रुपये हो जाएगा। यह 12.84% की वृद्धि होगी।
