पटना [बिनय मिश्रा]। बक्सा में का है? पत्नी के सवाल पर नेताजी थोड़े अकबकाए। साहस कर बोले, अपने काम से काम रखो। मौलिक अधिकार का हनन होता देख पत्नी ने आंखें प्रिविलेज मोशन में चमकाईं। ड्राइंग रूम में मुंहजोर जी नहीं बैठे होते तो मायके वाली भाषा का प्रयोग होता...।

खैर, अभी बायकॉट कर गईं। अंदर वाले कमरे में हो रही उठा-पटक की आवाज ड्राइंग रूम तक पहुंच रही थी। पसीना-पसीना नेताजी पर्दा हटाकर प्रकट हुए। कुछ लजाए-सकुचाए।

कचौड़ी गली से तीन समोसे और छह जलेबी दाबकर न्यू कैपिटल पहुंचे मुंहजोर जी की सुबह फील गुड वाली थी। इसलिए न तो घंटे भर का इंतजार बुरा लगा और न ही नेताजी की लज्जा भरी मुस्कान पर कोई खïट्टा सवाल याद आया। हां, यह जरूर सोच रहे थे कि चुनाव आते ही माननीय लिटरली माननीय लगने लगते हैं। सभ्य, सुसंस्कृत, विनयी, सहनशील...इत्यादि। सुंदर, सुशील गृह कार्य में दक्ष जैसे विशेषण भी याद आए, लेकिन फिर खुद को करेक्ट किया कि ये तो वर-वधु विज्ञापन पृष्ठ का कंटेंट है।

मुंहजोर जी अपना मुंह खोलते उसके पहले नेताजी ने ही साफ किया। कुछ दस्तावेज खोज रहे थे हे हे हे...। माफ कीजिएगा, आपको बैठना पड़ा। दिन में टाइमे नहीं मिलता। कार्यकर्ता मीटिंग। टिकट की सेटिंग। रात में याद आया। सोचे भोरे-भोरे खोज लेंगे। और बताइए। घूम-फिर रहे, क्या समझ रहे?

यही हो रहा आजकल। इंटरव्यू कब रिवर्स गियर में चला जाता, पता नहीं चलता। सवाल पूछने के पहले नेताजी ही पूछ बैठते हैं कि क्या होगा...। क्या समझ आ रहा? पत्रकार न हुआ, आइबी का एजेंट हो गया। उस दिन तो गजबे हो गया। फोन आया बड़बोला पत्रकार का।

मुंहजोर जी अपना ओपिनियन देते रहे। सोचे थे कि स्टोरी आइडिया रिच कर रहे होंगे। बाद में क्लियर हुआ कि बगल में बैठे बड़े वाले नेताजी स्पीकर ऑन करा दिए थे। सब फीडबैक ले रहे। धीरे से कोई बोला था, डरे हुए हैं जी।

विनयी, विनीत नेताजी का व्यवहार आज सरल नहीं था। मुंहजोर जी पूछ बैठे। कोई परेशानी है क्या? चुनाव टेंशन दे ही देता है। पत्नी को डांटने की हिम्मत दिखाने वाले नेताजी का धैर्य इस बार टूट गया। बोले, क्या बताएं...।

सर्टिफिकेट वाली फाइल नहीं मिल रही। पिछली बार हलफनामा में भर दिए थे बीए पास। लेकिन कॉलेज का नाम याद नहीं आ रहा। कभी गए भी नहीं। तोमरवा की तरह पकड़ा गए, तो नाम भी नहीं बता पाएंगे।

सुने हैं, घुमाकर कॉलेज का लोकेशन वेरीफाइ करता है। फाइलवा मिल जाता, तो एक बार कॉलेज का बिल्डिंग घूम आते...। पटना आने के बाद दिन भर में सात बार 'कौन बिरादर' पूछे जाने से परेशान मुंहजोर जी को भी अपनी फाइल याद आने लगी। पता नहीं कहां-कहां से डिग्री जुगाड़े हैं। एक बार 'कैंपस विजिट' जरूरी है भाई...।

Posted By: Kajal Kumari

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस