समस्तीपुर, जेएनएन। एकतरफ जहां लॉकडाउन शुरू होते ही बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों के मालिकों ने अपने कामगारों को नौकरी से निकाल दिया, जिसकी वजह से बेसहारा ये कामगार भूखे-प्यासे अपने घर पैदल आने को मजबूर हो गए। इन कामगारों ने दिल्ली और मुंबई की दूरी पैसे के अभाव में पैदल ही माप दी। वहीं, एक किसान एेसा भी है जिसने अपने फार्म हाऊस में काम करने वाले कामगारों को भूख से मरने के लिए नहीं छोड़ा, बल्कि उनके लिए हवाई जहाज का टिकट बुक करा दिल्ली से समस्तीपुर भेजा। अब ये कामगार अपने घर लौट आए हैं और अपने मालिक का गुणगान करते नहीं थक रहे। 

फ्लाइट का बस नाम सुनने वाले इन कामगारों ने पहली बार फ्लाइट में बैठने का जहां अनुभव बताया जो उनके लिए रोमांचक और अनोखा था वहीं इन कामगारों का कहना है कि एेसा मालिक नसीब से ही मिलता है, वे जब भी हमें बुलाएंगे, हम खुशी-खुशी वापस चले जाएंगे।

फ्लाइट से दिल्ली से लौटे श्रमिकों ने बताया अपना रोमांचक अनुभव

श्रमिकों ने बताया कि दिल्ली की डीटीसी बसों में सफर और उड़ान भरते प्लेन हमारी ऊंचाई का एहसास कराते रहे। जब, गांव की राह में बढ़े तो ट्रेन की डोलतीं जनरल बोगियां हमारी हकीकत बताती रहीं। यह कहते हुए लखींद्र राम और उनके साथ के सभी प्रवासी किसान श्रमिक उत्साहित नजर आते हैं। दिल्ली के किसान पप्पन सिंह गहलोत के कराए हवाई टिकट पर घर लौटे जिले के खानपुर प्रखंड के 10 श्रमिकों की भावनाएं सबकुछ बयां कर रही थीं। 

उन्होंने बताया कि गुरुवार का दिन सबकुछ बदला था। विशाल इमारत, शीशे से झांकते प्रवेश, चमचमाते फर्श और सुरक्षा में चाक-चौबंद जवान। बाहर सड़कों पर सरपट भागती दिल्ली पुलिस की पीसीआर वैन। ये माहौल बता रहा था कि हम किसी आम जगह पर नहीं। दिल्ली के इंदिरा गांधी हवाई अड्डे के अंदर घुसते ही वहां की औपचारिकताएं दिल और दिमाग, दोनों को सहमा रही थीं। फर्श पर पांव और मन में भावनाएं, दोनों को काबू में रख पाना मुश्किल हो रहा था। हम में से हर कोई घबरा रहा था। 

बस और ट्रेन से आगे यह नई उड़ान

नवीन बताते हैं कि हमारी परेशानी अधिकारियों से छुपी न रही। यह स्वाभाविक भी था। एयरपोर्ट अथॉरिटी के एक अधिकारी मदद को आगे बढ़े। कई काउंटरों तक ले गए और हमारा काम करा दिया। सबकुछ ओके होने के बाद सभी को प्लेन तक पहुंचाया। रास्ते में कई जानकारी भी दी। उनकी ये बातें हमारा उत्साह और घबराहट दोनों बढ़ा रही थीं। सामने लाल-सफेद चमचमाते प्लेन देख मन भावुक था। 

प्रवीण कुमार बताते हैं कि प्लेन के अंदर घुसते ही हम सभी की धड़कनें बढ़ गई थीं। सुबह साढ़े पांच बजे भी हमारे माथे पर पसीने की बूंदे थीं। प्लेन के एक अधिकारी हम सभी को अपनी-अपनी सीट पर बैठा गए। बस और ट्रेन से आगे यह हमारी नई उड़ान थी।

कुछ बातें समझीं, कुछ लोगों की देखा-देखी 

जितेंद्र कुमार कहते हैं, अंग्रेजी-ङ्क्षहदी में बहुत सारी बातें बताई जा रही थीं। कुछ समझे, बाकी दूसरों की देखा-देखी। हम सभी के सीट बेल्ट बांध दिए गए। इससे हमें लगा, उडऩे का वक्त आ गया। कई ने तो अपनी आंखें बंद कर लीं। प्लेन रनवे पर भाग रहा था। करीब छह बजे, थोड़ी झुकी और फिर टेक-ऑफ...। नवीन राम का कहना है, शहरों से ऊपर बादलों में गोता लगाते प्लेन की खिड़कियों से बाहर झांकने तक की हिम्मत नहीं हो रही थी। बस और ट्रेन की विंडो सीट के लिए हम कई बार नोकझोंक कर चुके थे, पर यहां बात वो नहीं थी। 

पता नहीं चला कब पहुंचे पटना

लखींद्र बताते हैं कि अभी हम इधर-उधर देख ही रहे थे कि लगभग सात बजे घोषणा हुई कि हम शीघ्र पटना पहुंचनेवाले हैं। यह भी कम आश्चर्य भरा नहीं था। ट्रेन की उबाऊ यात्रा के आगे पलक झपकते यह उड़ान सपनों से ऊंची रही...। 

Posted By: Kajal Kumari

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