पटना की सड़कों पर लहरिया कट बाइक चलाने वालों पर पीके दास ने बड़ी कार्रवाई की। हजारों की संख्या में बिना हेलमेट बाइक चलाने वालों का चालान काटा। सड़क सुरक्षा को लेकर जागरूकता भी फैलाई। पीके दास फिलहाल बीएमपी में कमांडेंट हैं, मगर उनकी बड़ी पहचान पटना के पूर्व ट्रैफिक एसपी के रूप में है। बतौर ट्रैफिक एसपी उन्होंने सुरक्षित व सुगम यातायात के कई उपाय किए।

पीके दास कहते हैं, पुलिस का काम सिर्फ क्राइम कंट्रोल नहीं बल्कि हर तरह की सुरक्षा मुहैया कराना है। ट्रैफिक का भी इसमें अहम रोल है। भारत में सड़क हादसे एक बड़ी समस्या है। ट्रैफिक एसपी रहते हुए मैंने सड़क सुरक्षा को मिशन के तौर पर लिया। पटना का ट्रैफिक सिस्टम भी दुरुस्त किया। चौराहों और ट्रैफिक पोस्ट पर कैमरे से भी निगरानी शुरू हुई।

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वे कहते हैं कि मॉर्डन एप्रोच अपनाकर पुलिसिंग और ट्रैफिक व्यवस्था दोनों को बेहतर बनाया जा सकता है। घटना छोटी या हो बड़ी, हादसे के बाद सिर्फ केस दर्ज करने या दोषी ड्राइवर को सजा देने से समाधान नहीं होगा बल्कि दुर्घटना के पीछे की वजह जानना जरूरी है। इसके लिए परिवहन विभाग, नगर निगम से लेकर थाना पुलिस को संयुक्त रूप से जुट कर काम करना होगा।

दूसरे देशों से लेनी होगी सीख
पीके दास बताते है कि 1960 के बाद अमेरिका, जापान, फ्रांस और नीदरलैंड में गाडिय़ों की संख्या तेजी से बढ़ी लेकिन दुर्घटनाओं का ग्राफ गिरता गया। कारण इन चारों देशों में दुर्घटना होने पर सिर्फ ड्राइवर नहीं बल्कि ट्रैफिक व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों की जवाबदेही की भी जांच होती है। देखा जाता है कि पुलिस ने हाई स्पीड पर लगाम लगाने के लिए क्या किया? साइन बोर्ड था या नहीं, अगर नहीं तो विभाग पर कार्रवाई करती है।

गाड़ियों के हाई स्पीड पर कंट्रोल न लगाने पर संबंधित को नोटिस दी जाती है। यह भी देखा जाता है कि एम्बुलेंस पहुंचने में देरी क्यों हुई? बिना एयर बैग की गाड़ी सड़क पर उतारने वाली कंपनियों को भी नोटिस दी जाती है। पटना या भारत के अन्य शहरों में यह कम देखा जाता है। बात सिर्फ थाने तक सिमट कर रह जाती है या फिर चालक की गलती बताकर मामला क्लोज हो जाता है।

विभागों के बीच हो समन्वय
पटना में अगर बेली रोड और अशोक राजपथ पर स्पीड डिटेक्शन की व्यवस्था नहीं है, तो हाइवे पर गाडिय़ों की स्पीड कंट्रोल कैसे की जा सकती है। ऐसे में बेली रोड सहित शहर से जुड़ने वाले प्रमुख मार्ग पर हाई स्पीड कंट्रोल के लिए उपकरण लगाने की जरूरत है। घटना छोटी हो या बड़ी, मामला एक दूसरे पर फेंकने के बजाय आपसी समन्वय बनाएं। परिवहन, सड़क निर्माण विभाग, ट्रैफिक पुलिस, थाना पुलिस से लेकर एक्सपर्ट तक इसके लिए को-ऑर्डिनेट करें।

ब्लैक स्पॉट की पहचान कर करें दुरुस्त
पीके दास की मानें तो राजधानी में मैन पॉवर की कमी नहीं, बल्कि आधुनिक सिस्टम की जरूरत है। एक बानगी के तौर पर वे कहते हैं कि जनगपुरा रोड पर बार-बार हादसा होता है। हम सिर्फ इसे ब्लैक स्पॉट बताकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। एक ही सड़क या स्पॉट पर बार बार दुर्घटना होने पर वहां ब्लैक स्पॉट बनाने से काम नहीं चलेगा बल्कि वहां इंजीनियर, ट्रैफिक पुलिस, निगम और अन्य जिम्मेदार विभाग के एक्सपर्ट को पहुंचकर कमियों को समझना होगा। वहां रोड साइन बोर्ड लगाए जाएं, ट्रैफिक जवानों की तैनाती हो। हाईस्पीड पर शिकंजा कसा जाए तो काफी हद तक दुर्घटनाओं में कमी आ सकती है।

ऑटोमैटिक रेड सिग्नल सिस्टम को दिया जाए बढ़ावा
ट्रैफिक कंट्रोल रूम में बैठकर नहीं बल्कि जाम या दुर्घटना वाले स्थानों पर पहुंचकर रिसर्च करना जरूरी है। एक पैनल बनना चाहिए, जो सीनियर लेवल का होना चाहिए। इसमें ट्रांसपोर्ट, रोड, ट्रैफिक, सीनियर अफसर के साथ ही थाना स्तर पर हर दुर्घटना का डाटा उपलब्ध होना चाहिए। इसके साथ ही डाकबंगला, बोर्डिंग रोड, बेली रोड, हड़ताली मोड़ सहित प्रमुख चौराहों पर जेब्रा क्रासिंग के साथ ही ऑटामैटिक रेड सिग्नल सिस्टम होना चाहिए।

ओवरटेक के लिए रिर्जव हो एक लेन
छह लेन पर टू प्लस वन लेन की व्यवस्था होनी चाहिए। मतलब टू लेन में एक लेन रिर्जव हो ताकि रिर्जव लेन में वाहन ओवरटेक कर सके। इसके बाकी के लेन में वाहन अपनी गति के मुताबिक चलते रहेंगे। एम्बुलेंस की व्यवस्था ऐसी हो कि दुर्घटना की सूचना मिलने के दस मिनट भीतर घटनास्थल पर पहुंच सके और अस्पताल में ऐसे मरीजों के लिए बेड आरक्षित हो।

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By Gaurav Tiwari