पटना निवासी 52 वर्षीय आर्किटेक्ट विष्णु चौधरी सरकारी और निजी क्षेत्र के विकास मॉडल का 25 वर्षों का अनुभव रखते हैं। वे 70 के दशक से अपने ऐतिहासिक शहर की पुरानी यादों और बदलाव के गवाह रहे हैं। संत जेवियर्स हाईस्कूल से मैट्रिक तक पढ़ाई की। बाद में 1993 तक पटना इंजीनियरिंग कॉलेज (अब एनआइटी) में पढ़ाई की। अपने शहर को शानदार बनाने की मुहिम में शामिल हों, यहां करें क्लिक और रेट करें अपनी सिटी 

आर्किटेक्ट की डिग्री लेने के बाद उन्होंने शहरी विकास के डिजाइनिंग के क्षेत्र में काम शुरू कर दिया। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्किटेक्ट बिहार-झारखंड के अध्यक्ष और एनआईटी, पटना के गेस्ट फैकल्टी के रूप में अपनी सेवा दे रहे हैं। सरकारी क्षेत्र में बिहार विधानसभा भवन और पटना एसएसपी भवन के डिजाइन में भी इनकी साझेदारी रही है। इन्होंने डिजाइनिंग के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कार भी हासिल किए हैं।

विष्णु चौधरी कहते हैं, पटना को राजधनी बने 100 साल से अधिक हो गए। समय के साथ शहर का विस्तार हुआ, लेकिन अनियोजित तरीके से। जहां पानी के जहाज चलते थे, वहां मरीन ड्राइव बन रहा है। सड़कें चौड़ी हुईं। फ्लाई ओवर और आरओबी का निर्माण हुआ, लेकिन ड्रेनेज, सीवरेज सिस्टम, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, पार्किंग, रैन बसेरा, हरित क्षेत्र, खेल मैदान, मनोरंजन सहित नगरीय जीवन की बुनियादी जरूरतें कम पड़ती गईं। शहर का निर्माण लंबवत होता चला गया। कम जगह में अधिक लोगों के निवास का विकल्प चुन लिया गया। भीड़ की वजह से लोगों की समस्याएं भी बढ़ती गईं। 

दुरूस्त करना होगा ड्रेनेज सिस्टम

पटना की बसावट गंगा के किनारे ऊंची जगह पर थी। दक्षिण हिस्से में गांव और खेती योग्य भूमि थी, जहां जलजमाव रहता था। शहर की बसावट आरंभ से ही कटोरे के आकार की रही है। जलनिकासी के लिए संप हाउस का निर्माण हुआ, लेकिन प्लान के अनुसार ड्रेनेज सिस्टम नहीं बन सका।

कंकड़बाग ड्रेनेज प्रोजेक्ट का काम 2006 में शुरू हुआ, लेकिन 12 वर्षों में भी कई जगह कमियां दूर नहीं हो सकीं। बेहतर जिंदगी के लिए पटना के ड्रेनेज और सीवरेज सिस्टम के साथ सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की जरूरत है। यदि जल निकासी का प्रबंध हो जाए तो शहरी जीवन बेहतर बन सकता है।

शहर में बढ़ानी होंगी जनसुविधाएं

शहरी विकास में पटना जंक्शन के आसपास पार्किंग, यात्री निवास, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और जन सुविधाएं कम पड़ गईं। उदाहरण के तौर पर बांकीपुर जेल को जब बेउर में शिफ्ट किया गया, तो बहुत बड़ी जगह मिली थी। यहां पार्किंग, यात्री निवास, मनोरंजन केंद्र, हाट और जन सेवाओं के लिए विकसित किया जा सकता था। राजधानी में सार्वजनिक शौचालयों और यूरिनल की बहुत कमी है। बड़े-बड़े बाजार हैं, मगर यूरिनल नहीं है। इसके कारण शहर गंदा दिखता है।

प्रदूषण नियंत्रण की करनी होगी पहल

महानगरों की तरह पटना में वाहनों की भीड़ के कारण वायु की गुणवत्ता खराब हुई है। शहर के बीच गांधी मैदान क्षेत्र और गंगा किनारे निकली भूमि को हरित क्षेत्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। इससे लोगों को स्वच्छ हवा और हरियाली के साथ वायु गुणवत्ता में सुधार आ सकता है। पुराने वाहनों पर रोक लगानी होगी। ईट भट्ठों पर रोक लगानी होगी।

नए इलाके किए जाएं विकसित

पटना पर आबादी का बड़ा बोझ है। हर सुविधा के लिए लोग पटना आने को मजबूर हैं। ऐसे में शहर के आसपास उप-नगर बसाने होंगे। प्लानिंग में भी इसका ध्यान रखना होगा। बिहार म्यूजियम, कन्वेंशन सेंटर और बुद्ध स्मृति पार्क और एयरपोर्ट शहर के बाहर बनाए गए होते तो शहर के आसपास के इलाके भी तेजी से विकसित होते।

जल परिवहन फिर हो शुरू

अंग्रेजों के समय में पटना की पहचान इसके जल परिवहन के कारण भी थी। गंगा नदी के किनारे बसे होने के कारण दूर-दराज से सामान जल मार्ग से पहुंचते थे। इस परिवहन व्यवस्था को फिर से विकसित करने की जरूरत है। हल्दिया-इलाहाबाद जलमार्ग को फिर से शुरू करने की बात की भी जा रही है, इसमें तेजी लाना होगा। इससे माल ढुलाई सस्ती हो सकेगी। शहर के बाहर रेलवे यार्ड बनाना होगा, ताकि शहर में भारी वाहनों का दबाव कम हो।

By Nandlal Sharma