श्रवण कुमार, पटना। यह कहना अतिशय नहीं होगा कि पटना का डाकबंगला बिहार की 'राज' नीति का चौराहा रहा है। राजनीति का सफर चाहे यूनिवर्सिटी से शुरू हुआ हो या फिर श्रमिक संगठन के दफ्तरों से। राजनीतिक दिशा चाहे लेफ्ट की हो या फिर राइट की। पार्टी के कार्यालय चाहे सदाकत आश्रम में हों या वीरचंद पटेल पथ पर। बगैर डाकबंगला चौराहे से गुजरे बिहार की 'राज' नीति का सफर तय नहीं होता। सैकड़ों आंदोलन, प्रदर्शन, धरना, लाठीचार्ज, बंद का गवाह डाक बंगला चौराहा आज भी राजनीति का सफर करने वालों की राह बना हुआ है।

कभी था ब्रिटिश हाकिमों का गेस्ट हाउस

अंग्रेजों के जमाने का बना आलीशान डाक बंगला कभी ब्रिटिश हाकिमों का गेस्ट हाउस हुआ करता था। जब बांकीपुर रेलवे स्टेशन (अब पटना जंक्शन) बना और अंग्रेज अधिकारी आने-जाने लगे, तब उनके प्रवास के लिए पास में ही डाकबंगला बनाया गया था। यह बंगला स्टाइलिश लुक और साज-सज्जा का खूबसूरत नमूना हुआ करता था। मोटी-मोटी दीवारें और खपरैल की छत का यह बंगला 80 के आसपास तक मौजूद था। इस डाक बंगला के नाम पर ही पटना का हृदय स्थल डाकबंगला चौराहा के नाम से जाना जाने लगा। जब तक डाकबंगला रहा, यहां राजनेताओं और हाकिमों का प्रवास हुआ। डाकबंगला की जगह लोकनायक जयप्रकाश नारायण बन गया, पर चौराहा आज भी डाकबंगला के नाम से ही चर्चित है।

छोटे-बड़े बदलाव का रहा साक्षी

राजधानी का डाकबंगला चौराहा बिहार की राजनीति के हर छोटे-बड़े बदलाव का साक्षी रहा है। राजनीति के अब तक के सबसे बड़े आंदोलन 'संपूर्ण क्रांति' की राह भी वाया डाक बंगला ही तय की गई थी। महंगाई ,भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शिक्षा नीति के खिलाफ 1974  में छात्रों व युवकों ने आंदोलन किया। 18 मार्च 1974 को एक छोटा सा जुलूस पटना विश्वविद्यालय से विधानसभा घेरने वाया डाक बंगला ही पहुंचा। छात्रों की वैसी धमक पहले कभी नहीं सुनी गई थी। डाकबंगला और इसके पास ही स्थित बुद्ध मार्ग तब ङ्क्षहसा और तोड़-फोड़ का गवाह भी बना था। बुद्ध मार्ग स्थित एक अखबार के दफ्तर को भी आंदोलनकारियों ने फूंक दिया था। आंदोलन को ङ्क्षहसक होने से जयप्रकाश नारायण खफा थे।

बाद में उन्होंने आंदोलन का नेतृत्व अपने हाथ में लिया। इस दौरान पांच जून 1974 को जयप्रकाश नारायण जब तत्कालीन राज्यपाल आर. डी. भंडारे को एक करोड़ 37 लाख लोगों का हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन देकर लौट रहे थे, जुलूस पर गोलियां चला दी गई थी। तब भी डाक बंगला और बेली रोड अफरा-तफरी का गवाह बना था। आंदोलनकारी इसी रास्ते गांधी मैदान पहुंचे थे, जहां जुलूस जनसभा में तब्दील हो गया था। वर्तमान में बिहार के तमाम शीर्ष नेता नीतीश कुमार, लालू प्रसाद, सुशील कुमार मोदी, रामविलास पासवान, नंद किशोर यादव, अश्विनी चौबे समेत अन्य कई की राजनीतिक राह को इस आंदोलन ने ही दिशा दी।

बिहार बंद का मुख्य केंद्र रहा है डाक बंगला चौराहा

बंद चाहे किसी भी दल द्वारा क्यों न हो, केंद्र डाकबंगला चौराहा ही हुआ करता है। डाकबंगला से थोड़ी दूर पर वीरचंद पटेल पथ पर ही राज्य के मुख्य राजनीतिक दलों के कार्यालय हैं। भाजपा, राजद, जदयू, रालोसपा सहित अन्य दल पटेल पथ पर ही हैं। जब भी इन दलों द्वारा बंद का आयोजन होता है आम तौर पर नेताओं की पदयात्रा वीरचंद पटेल पथ वाया इनकम टैक्स-डाकबंगला चौराहा ही हुआ करती है। बंद के दौरान अक्सर डाकबंगला चौराहे पर ही नेताओं व समर्थकों का जुटान और प्रशासन द्वारा गिरफ्तारी जैसी कार्रवाई की जाती है।

लालू-राबड़ी शासन काल में मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने कम से कम दर्जन बार बिहार बंद और आक्रामक प्रदर्शन किया। नक्सली वारदातों, विधि-व्यवस्था, चारा घोटाला जैसे मुद्दों पर भाजपा के नेता सुशील कुमार मोदी, नंदकिशोर यादव से लेकर तमाम नेताओं व कार्यकर्ताओं ने डाक बंगला चौराहा पर प्रदर्शन किया है और गिरफ्तारियां दी है। डाक बंगला चौराहे पर विरोध, प्रदर्शन और बंद की राजनीति ने भाजपा नेताओं को सत्ता और नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई।

दिल्ली तक गूंजी इस चौराहे की आवाज

2012 में मधुबनी में पुलिस गोलीबारी में दो छात्रों की मौत और गया के परैया में गोलीबारी की गूंज पटना के डाकबंगला चौराहे पर भी गूंजी थी। पूरा बिहार बंद किया गया था। इस बंद में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद, लोजपा के अध्यक्ष रामविलास पासवान, तब राजद में रहे रामकृपाल यादव, अब्दुल बारी सिद्दिकी, रामचंद्र पूर्वे, रामचंद्र पासवान, वाम नेता अरूण कुमार मिश्रा, राजेंद्र सिंह समेत सैकड़ों नेताओं ने गिरफ्तारी डाक बंगला चौराहा पर ही दी थी।

प्रदर्शन करने वालों का आज चमक रहा चेहरा

जब भाजपा का साथ नीतीश कुमार से छूटा, तब भाजपा ने फिर डाक बंगला चौराहा की ओर ही रुख किया था। 18 जून 2013 को भाजपा ने नीतीश कुमार के खिलाफ विश्वासघात दिवस मनाते हुए बिहार बंद का आयोजन किया। पार्टी के नेता डा. सी. पी. ठाकुर, सुशील कुमार मोदी, राजीव प्रताप रूढ़ी, सैयद शाहनवाज हुसैन, रविशंकर कार्यकर्ताओं के साथ पार्टी कार्यालय से प्रदर्शन करते हुए डाक बंगला चौराहा पहुंचे थे। यहीं इन नेताओं को गिरफ्तार किया गया था।

कइयों ने छानी खाक

लालू प्रसाद की दूसरी पीढ़ी तेजस्वी यादव एवं तेजप्रताप यादव को भी डाक बंगला चौराहा की खाक छाननी पड़ी। जब नीतीश से राजद की दोस्ती खत्म हुई तब नई खनन नीति के विरोध में राजद ने बिहार बंद बुलाया। बंद के समर्थन में तेजस्वी, तेजप्रताप , रघुवंश प्रसाद एवं राजद के प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे के नेतृत्व में प्रदर्शन करते हुए डाक बंगला पहुंचे। यहां इन नेताओं को प्रशासन ने हिरासत में ले लिया।

केंद्र में मंत्री रहे उपेंद्र कुशवाहा की नाराजगी भी जब सरकार के साथ हुई , तब शिक्षा में सुधार का बहाना बना सड़क पर उतरे। प्रदर्शन किया तब पुलिस ने लाठियां चटकाई। उपेंद्र कुशवाहा समेत अन्य पार्टी नेता घायल हुए तब बिहार बंद किया गया। पांच फरवरी 2019 को बिहार बंद में कुशवाहा के समर्थन में राजद के प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे , कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य अखिलेश प्रसाद सिंह समेत हम एवं अन्य दलों के नेता डाक बंगला पर धरने पर बैठे।

छात्र आंदोलन भी गुजरती रही डाकबंगला की राह

यूनिवर्सिटी एवं छात्रों की राजनीति भी डाक बंगला की राह से गुजरती रही है। जब भी छात्रों ने किसी भी मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद की है प्रदर्शन, पुतला दहन के लिए अक्सर डाक बंगला चौराहा को ही चुना है। 26 मार्च 2015 को शिक्षा व्यवस्था की बदहाली के खिलाफ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने विधानसभा घेराव का आह्वान किया। छात्रों का प्रदर्शन गांधी मैदान से शुरू होकर डाक बंगला चौराहा से गुजरते हुए ही विधानसभा की ओर कूच किया। हालांकि आर. ब्लॉक चौराहे पर छात्रों की पुलिस से भिड़ंत हो गई। सात जुलाई 2018 को जब छात्रों-युवाओं का भविष्य एवं बिहार को विशेष राज्य का दर्जा के लिए जब जन अधिकार पार्टी लोकतांत्रिक के राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव सड़क पर उतरे तब उन्होंने भी डाक बंगला चौराहे तक का ही सफर तय किया।

श्रमिक संगठनों के आंदोलन का केंद्र रहा चौराहा

हर वर्ग के कार्यकर्ताओं का होता है जुटान

बिहार में श्रमिक संगठनों ने भी आंदोलन का केंद्र डाक बंगला चौराहा को बनाया है। हाल के दिनों में श्रमिक संगठनों की सबसे बड़ी बंदी में आठ जनवरी 2019 को दो घंटे से अधिक समय तक ट्रेड यूनियनों ने डाक बंगला चौराहा पर पूरी तरह से कब्जा जमा लिया था। आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी सेविका, रसोइया संघ, इंटक समेत अन्य कई संगठनों ने हड़ताल का आयोजन संयुक्त रूप से किया था। इस दौरान उनके प्रदर्शन का केंद्र डाक बंगला ही बना। देश भर में या राज्य में जब भी कोई बड़ा आंदोलन या राजनीतिक आहवान होता है, पटना के डाक बंगला चौराहा पर उसका शोर अवश्य सुनाई देता है।

Posted By: Akshay Pandey

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