क्या बिहार में बिखर गया महागठबंधन? RJD और कांग्रेस ने एक-दूसरे पर बोला हमला, पढ़िए Inside story
Bihar Politics: बिहार में महागठबंधन में दरार दिख रही है, राजद और कांग्रेस के बीच तनाव बढ़ गया है। राजद ने कांग्रेस पर कमजोर प्रदर्शन का आरोप लगाया, जबकि कांग्रेस ने इसे खारिज कर दिया। इस अनबन से बिहार की राजनीति में सरगर्मी है और देखना होगा कि गठबंधन का भविष्य क्या होता है।

महागठबंधन में बिखराव के मिल रहे संकेत। जागरण आर्काइव
राज्य ब्यूरो, पटना। विधानसभा चुनाव (Bihar Chunav) में हार के दोषारोपण वाले बयानों से महागठबंधन में खटास बढ़ रहा है। हालांकि, बयानबाजी शीर्ष स्तर के नेताओं के बीच नहीं, फिर इससे देर-सबेर बिखराव की आशंका को बल मिल रहा।
कारण यह कि घटक दल, विशेषकर राजद और कांग्रेस, अपनी-अपनी हार के लिए एक-दूसरे को दोषी ठहरा रहे। समीक्षा बैठकों में वोटों के हस्तांतरण, समन्वय और भितरघात जैसे पहलुओं पर भी एक-दूसरे की ओर अंगुली उठाई जा रही है।
कांग्रेस अपनी पराजय का मूल कारण राजद को बता रही तो राजद का कहना है कि कांग्रेस जो कुछ भी है, वह राजद के बल-बूते ही। उसकी अपनी कोई औकात नहीं। चाहे तो अलग होकर देख ले।
कांग्रेस को बेऔकात बता राजद दे रहा अकेले होने की चुनौती
बहरहाल दोनों दलों के बयान गठबंधन की कमजोर कड़ियों को उजागर कर रहे हैं। कांग्रेस को राजद बेऔकात मान रहा, जबकि राजद को कांग्रेस अवसरवादी बता रही है।
शनिवार को उनके सरकारी आवास पर हुई बैठक में तेजस्वी यादव को महागठबंधन विधायक दल का नेता तो चुन लिया, लेकिन सीट बंटवारे और दोस्ताना संघर्ष पर खुली बहस से तनाव बढ़ा है।
इससे पहले 27 नवंबर को दिल्ली में हुई कांग्रेस की समीक्षा बैठक में महागठबंधन की हार के लिए मूलत: राजद को जिम्मेदार ठहराया जा चुका था। पलटवार की चिंगारी तभी से सुलग रही थी।
अंतत: कांग्रेस को शक्ति-हीन करार देते हुए राजद के प्रदेश अध्यक्ष मंगनीलाल मंडल ने कहा कि अलग होकर लड़ने पर अपनी औकात का पता चलेगा। प्रत्युत्तर में कांग्रेस के प्रवक्ता असित नाथ तिवारी और ज्ञान रंजन पूछ रहे कि तो फिर राजद ने कांग्रेस से गठबंधन क्यों किया?
परंपरागत जनाधार के लिए कांग्रेस में छटपटाहट
महागठबंधन को इस बार मात्र 35 सीटें मिली हैं। उनमें भी 25 राजद की हैं, जो सर्वाधिक 143 सीटों पर मैदान में थी।सीटों की तुलना में राजद का वोट प्रतिशत अलबत्ता अधिक है, लेकिन उसका परंपरागत जनाधार (मुसलमान-यादव) इस बार एकजुट नहीं रहा।
राजद और मुकेश सहनी को साथ लेकर कांग्रेस ओबीसी-ईबीसी वोटों की आस लगाए थी, जिस पर पानी फिर गया। अब कांग्रेस एक बार फिर पुराने जनाधार (सवर्ण-अनुसूचित जाति-मुसलमान) की ओर लौटना चाह रही।
यह 45 प्रतिशत से अधिक का वोट बैंक है। इसके लिए उसे अपनी राह और रणनीति स्वयं बनानी है। अनुसूचित जाति और मुसलमान का आसरा राजद को भी है। दोनों ओर माना जा रहा कि अपने भविष्य और आसरे का यह जुगाड़ साथ रहते संभव नहीं।
''तेजस्वी के नेतृत्व के अंगुली उठाना कतई उचित नहीं। राजद का बिहार में जनाधार है। अगर कांग्रेस को लगता है कि गठबंधन में रहने पर हार हुई है और अलग होना है, तो उसे मुबारक हो। हर एक को अलग चुनाव लड़ने पर असली ताकत का पता चल जाएगा। कांग्रेस को जो भी वोट मिले, वह राजद के कारण ही। फुलपरास में तो कांग्रेस का कोई कार्यकर्ता तक नहीं था। राजद कार्यकर्ता शुरू से गठबंधन के पक्ष में नहीं थे, लेकिन तेजस्वी यादव और पार्टी नेतृत्व ने सबको साथ लेकर चुनाव लड़ा।''
मंगनीलाल मंडल, राजद के प्रदेश अध्यक्ष
..............................................
''अगर कांग्रेस की कोई ताकत नहीं है, तो राजद ने हमसे गठबंधन क्यों किया? घटक दलों को एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए, अन्यथा इससे पता चलता है कि उन्हें गठबंधन धर्म की कोई जानकारी नहीं।''
असित नाथ तिवारी, कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता
..........................................
''मंडलजी मन की बात कर रहे। ऐसा नहीं होता। उन्हें कुछ कहना है तो महागठबंधन की समन्वय समिति के अध्यक्ष तेजस्वी यादव से कहें। महागठबंधन विजयी होता तो मुख्यमंत्री तेजस्वी बनते, फिर हार पर जिम्मेदारी किसकी है? चेहरा तो तेजस्वी ही थे!''
ज्ञान रंजन, कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता

कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।