पटना [विकाश चन्द्र पाण्डेय]। मधेपुरा लोकसभा चुनाव को लेकर बिहार का हॉट-हॉट सीट बन गया। मधेपुरा में एक कठिन लड़ाई में घिरे शरद यादव को भी इसका अनुमान नहीं रहा होगा कि चुनावी राजनीति इतनी कठिन हो सकती है। बहरहाल वे इस सीट पर सिमट कर रह गए हैं। कभी जनता दल और बाद में जनता दल (यूनाइटेड) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में दूसरों की जीत-हार की व्यूह रचना करने वाले शरद के लिए इससे अधिक मजबूरी क्या होगी! हसरत आठवीं बार संसद पहुंचने की है, जबकि राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव और दिनेश चंद्र यादव राह रोकने के लिए तैयार। कुछ ऐसे ही त्रिकोणात्मक संघर्ष में पिछली बार शरद धूल धूसरित हुए थे। इस बार इत्मीनान महज इतना कि साथ में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद हैं, जिनसे वे कभी मधेपुरा में जीतते-हारते रहे हैं।

 

मधेपुरा की लड़ाई हकीकत में लालू लड़ रहे। शरद यादव उनके प्रतिनिधि के रूप में मैदान में हैं। यह उसी दिन तय हो गया था, जब शरद यादव महागठबंधन के बीच सीटों के बंटवारे में मध्यस्थ की भूमिका में आए थे। संभवत: उन्होंने जार्ज फर्नांडिस की सियासी गति से सबक लिया होगा, इसीलिए वे मैदान में अकेले बूते नहीं उतरे। 2009 में जार्ज फर्नांडिस मुजफ्फरपुर में कुछ ऐसी ही मजबूर लड़ाई के लिए अभिशप्त हुए थे। उस हार के बाद वे राजनीतिक परिदृश्य से ही ओझल हो गए। दुर्योग कि सेहत भी बिगड़ती गई। उससे पहले 2004 में मधेपुरा में शरद को शिकस्त देकर लालू रेल मंत्री बने। जार्ज फर्नांडिस अब हमारे बीच नहीं रहे, जिनके साथ मिलकर शरद यादव ने जनता दल (यूनाइटेड) का गठन किया था। पिछली बार इसी पार्टी के टिकट पर शरद यादव 56209 मतों के अंतर से राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव से शिकस्त खा चुके हैं। बाद में उत्तराधिकार का सवाल उठाकर पप्पू यादव राजद से किनारा कर लिए। तब राजग से अलग होकर जदयू अपने बूते मैदान में था। भाजपा उम्मीदवार को मिले 252539 मत शरद यादव की हार के लिए निर्णायक साबित हुए। 

 

जाति के दायरे में जीत का समीकरण

मधेपुरा में जीत का समीकरण जाति विशेष के दायरे में कैद है। यहां एक नारा आम है : 'रोम है पोप का, मधेपुरा गोप का।' इलाके ने इसे चरितार्थ भी किया है। एकाध अपवाद छोड़ दें, तो अधिकांश चुनावों के विश्लेषण यही बताते हैं। पार्टियां बेशक बदलती रही हों, लेकिन सीट एक जाति के कब्जे में ही रही। वैसे राजनीतिक दल भी इससे अलग रुख अख्तियार करने की कभी हिम्मत नहीं जुटा पाए। इस बार भी गोप से गोप की टक्कर हो रही है। मुकाबले के तीनों उम्मीदवार यादव बिरादरी से। ऐसे में कैडर वोटों की अहमियत बढ़ जाती है। शरद यादव की परेशानी की एक वजह यह भी है। कैडर वोटों के मामले में भाजपा को महारत हासिल है और इस बार भाजपा-जदयू एक साथ हैं। मुकाबले के दूसरे उम्मीदवार पप्पू यादव की सियासी जड़ें उसी राजद की जमीन में हैं, जिससे शरद उम्मीदवार हैं। दिनेश चंद्र यादव राज्य सरकार में लघु जल संसाधन मंत्री हैं। पानी से पीडि़त (कोसी के संदर्भ) इस इलाके में सरकार की योजनाएं नए दौर से कदमताल की जरूरत बता रहीं। इसके समानान्तर शरद यादव के पास गिनाने के लिए अपनी समाजवादी पृष्ठभूमि, राजनीतिक अनुभव और बेदाग छवि है। 

लालू और शरद की मित्रता 

लालू और शरद की राजनीतिक मित्रता एक अंतराल के बाद दोबारा परवान चढ़ी है। कुछ अहसान भी हैं, जिसे चुकता करने के लिए यह चुनाव शायद आखिरी मौका है। लालू को मधेपुरा की राजनीति का सिद्धस्त माना जाता है, लेकिन राजग के उम्मीदवार के रूप में शरद यादव 1999 में लालू को वहां पटखनी देने में कामयाब रहे। तब लालू ने घोषणा कर रखी थी कि वे शरद को कागजी शेर और जनाधार विहीन नेता साबित कर देंगे। दूसरी तरफ शरद का दावा था कि वे खुद को यादवों का असली और बड़ा नेता साबित करेंगे। नतीजे ने लालू को निराश किया था। आज लालू उसी शरद को मंझधार से निकालने में लगे हुए हैं। यह उस उपकार का बदला भी हो सकता है, जो 1990 में शरद ने लालू को मुख्यमंत्री बनाने के लिए किया था। 

सहयोगी के हवाले सीट, पिछड़ती गई कांग्रेस 

कांग्रेसी चार बार जीते, लेकिन 1991 और 1996 में उनकी हालत पतली हो गई। तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा। थकी-हारी कांग्रेस ने यह सीट राजद के हवाले कर दी। वैसे भाजपा और वामपंथियों की दाल यहां कभी नहीं गली। एक अपवाद है। 1977 की गैर कांग्रेसी गोलबंदी में जनसंघ भी था, जब कांग्रेस की पराजय हुई। आखिरकार भाजपा ने समता पार्टी को यह सीट सौंप दी। जदयू उसी का रूपांतरण है।

Posted By: Rajesh Thakur

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