पटना। संस्कृति बहुत व्यापक शब्द है। अगर सरल शब्दों में इसकी व्याख्या की जाए तो यह हमारे जीवनशैली से जुड़ा है। जो हमारा आहार-व्यवहार है, वही हमारी संस्कृति है। मैथिली साहित्यकार शिवशंकर श्रीनिवास ने शनिवार को ये बातें बीआइए सभागार में कहीं।

प्रभा खेतान फाउंडेशन, मसि इंक और श्री सीमेंट की ओर से मैथिली के 10वें आयोजन में मैथिली के कथाकार श्रीनिवास ने न केवल अपनी साहित्यिक यात्रा पर बल्कि मैथिली साहित्य में हो रहे बदलाव और इसकी सभ्यता-संस्कृति पर विस्तार से प्रकाश डाला। कथाकार श्रीनिवास से बातचीत कथाकार और आलोचक अशोक ने की। बातचीत के दौरान श्रीनिवास ने कहा कि जो हमारा जीवन है, वही हमारी संस्कृति है और हमें इसी जीवन से सीखने की जरूरत है। इस जीवन को कहानी के रूप में लिखने की आवश्यकता है।

जीवन का मूल रहा गीत -

बातचीत के दौरान श्रीनिवास ने कहा कि मिथिला व आसपास के क्षेत्रों में लोगों के लिए गीत ही सबकुछ होता था। शादी-ब्याह से लेकर अन्य कार्य करते हुए लोग गीतों को अपने स्वर में गुनगुनाते थे। लोग गीतों में अपनी दिनचर्या बिताया करते थे। मन खुशी से भरा हो या फिर दुखी दोनों स्तर पर गीत ही उनका हमराही बनते थे। अपनी रचनाधर्मिता के बारे में लेखक ने कहा कि गांव-घरों में लोगों को गीतों को गाते देख लेखन की शुरुआत गीतों और कविता से की। कुछ समय बाद मुझे कविता पाठ करने को लेकर आमंत्रण मिलने लगा। कथाकार श्रीनिवास ने कहा कि गीत और कविता के साथ कथा लेखन के प्रति रूझान पैदा हुआ। बचपन में परदादी से किस्सा सुनते थे। उनकी किस्सों से एक मोह और जानने की उत्सुकता पैदा होती थी। उन्होंने कहा कि वर्ष 1971 में मित्र व कथाकार रहे अशोक की कथा 'मिथिला-मिहिर' में प्रकाशित हुई, जिससे काफी प्रभाव पड़ा। इसके बाद कविता और गीतों को लिखने के बाद कहानी लिखने के प्रति उत्सुकता बढ़ी।

कई कथा किस्से के रूप में हुआ परिवर्तित -

कथा और किस्सों पर प्रकाश डालते हुए लेखक ने कहा कि मैथिली में गप्प बहुत प्रचलित था, जो बाद में एक किस्सा का रूप ले लिया। कथा को आरंभ में आख्यान, गप्प, गल्प आदि कहा जाता था। मैथिली कथा साहित्य को पढ़ते हुए गौर किया कि कई कथाएं किस्सा मात्र हैं। मैथिली कथा के बारे में कहा कि 60 के दशक से पूर्व भी कई प्रकार की कहानियां लिखी गई किंतु ललित, राजकमल, मायानंद मिश्र आदि के आगमन के बाद मैथिली कथा समकालीन हो गई। उससे पहले की कथाओं में समय नहीं रेखांकित होता था। 60 के दशक में कथाओं में गहराई आने लगी।

जीवन की जरूरत पर कथा ने दिया बल -

बातचीत के दौरान श्रीनिवास ने कथा में जीवन की जरूरत पर बल दिया गया। नये कथाकारों पर कहा कि नए लोगों को परिवेश से अधिक कथ्य पर ध्यान रखने की जरूरत है। युवा पीढ़ी के लेखक कोई काम धैर्य के साथ करें। किसी प्रकार की कोई हड़बड़ाहट न हो और अधिक से अधिक पढ़ने का प्रयास करें। पुस्तकों के साथ अपने जीवन को भी पढ़ने का प्रयास करें। कार्यक्रम का संचालन व धन्यवाद ज्ञापन मसि इंक की संस्थापक और निदेशक आराधना प्रसाद ने किया। कार्यक्रम के दौरान अजीत आजाद, धीरेंद्र कुमार झा, भैरव लाल दास, तारानंद वियोगी, वीरेंद्र झा, बालमुकुंद, सत्यम, पुतुल प्रियंवदा, प्रियंका मिश्र आदि ने लेखक से कई सवाल कर जानकारी प्राप्त की।

Posted By: Jagran

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