पितृ तर्पण से हवन तक हर जगह क्यों इस्तेमाल होती है कुश? ये हैं 5 बड़ी वजहें
कुशी अमावस्या, जिसे कुशाग्रहणी अमावस्या भी कहते हैं, 11 सितंबर को मनाई जाएगी। इस दिन कुश घास को जड़ से ...और पढ़ें

पितृ तर्पण
HighLights
कुशी अमावस्या पर कुश घास उखाड़ने की परंपरा।
पितृ तर्पण, हवन-यज्ञ में कुश का विशेष महत्व।
ब्रह्मा, विष्णु, शिव का वास कुश के भागों में।
जागरण संवाददाता, पटना। भाद्रपद अमावस्या को कुशाग्रहणी या कुशी अमावस्या के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष कुशी अमावस्या 11 सितंबर को मनाई जाएगी। हिंदू धार्मिक परंपराओं में इस दिन कुश घास को जड़ से उखाड़कर ग्रहण करने का विधान है। मान्यता है कि कुशी अमावस्या पर ग्रहण की गई कुश का प्रयोग पूरे वर्ष पितृकर्म, पूजा-पाठ, तर्पण, हवन-यज्ञ और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है।
1. पितृ तर्पण में कुश का खास स्थान
कुशी अमावस्या पर पितरों के लिए तर्पण करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार काले तिल, जल और कुश हाथ में लेकर पितरों का ध्यान करते हुए तर्पण किया जाता है।
पितृकर्म में कुश का इस्तेमाल लंबे समय से चली आ रही शास्त्रीय परंपरा का हिस्सा है। माना जाता है कि इससे पितरों को तर्पण अर्पित किया जाता है।
2. हवन-यज्ञ और संकल्प में होता है प्रयोग
कुश का इस्तेमाल हवन-यज्ञ सहित कई धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है। सत्यनारायण व्रत-कथा के संकल्प, नवग्रह हवन और अन्य पूजा विधियों में भी कुश के प्रयोग का उल्लेख मिलता है। धार्मिक कर्मकांड में संकल्प और अनुष्ठान की विभिन्न विधियों के दौरान इसका उपयोग किया जाता है।
3. विवाह से कलश-स्थापन तक उपयोग
धार्मिक विधियों में कुश का प्रयोग केवल पितृकर्म तक सीमित नहीं है। विवाह एवं कन्यादान, कलश-स्थापन और विभिन्न व्रतों में भी कुश का इस्तेमाल किया जाता है। यही वजह है कि कुशी अमावस्या पर ग्रहण की गई कुश को पूरे वर्ष धार्मिक कार्यों के लिए सुरक्षित रखने की परंपरा रही है।
4. कुश के मूल, मध्य और अग्रभाग में देवताओं की मान्यता
ज्योतिष आचार्य पंडित राघव नाथ झा के अनुसार धार्मिक मान्यताओं में कुश के मूल, मध्य और अग्रभाग में क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और शिव की प्रतिष्ठा मानी गई है।
इसी मान्यता के कारण धार्मिक अनुष्ठानों में कुश को विशेष पवित्रता प्रदान की गई है। कुश का प्रयोग पूजा की शास्त्रीय विधियों में महत्वपूर्ण माना जाता है।
5. ध्यान और साधना से भी जुड़ा है कुश
कुश का संबंध केवल पूजा और पितृकर्म से नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने ध्यान के लिए कुशासन का उल्लेख किया है।
इससे धार्मिक परंपरा में कुश के साधना और ध्यान से जुड़े महत्व का भी पता चलता है। कुश से बने आसन का प्रयोग प्राचीन काल से ध्यान और धार्मिक साधना में किए जाने की परंपरा रही है।
कुशी अमावस्या पर कुश ग्रहण करने की परंपरा
कुशी अमावस्या के दिन कुश को जड़ से उखाड़कर ग्रहण करने की परंपरा है। कुश निकालने से पहले प्रार्थना की जाती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन ग्रहण की गई कुश पूरे वर्ष धार्मिक कार्यों में प्रयोग की जा सकती है। इस दिन कुश की धार्मिक महत्ता समझने के साथ इसके संरक्षण का संकल्प भी लिया जाता है।
पितरों के लिए तर्पण और दान-पुण्य का विधान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुशी अमावस्या पर सूर्योदय से पहले उठकर स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करने की परंपरा है। इसके बाद काले तिल, कुश और जल हाथ में लेकर पितरों का ध्यान करते हुए तर्पण किया जाता है।
अमावस्या पर अपनी क्षमता के अनुसार गरीब और जरूरतमंद लोगों को अन्न-वस्त्र का दान तथा गाय, कौआ आदि जीवों को भोजन कराना भी शुभ माना जाता है।
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