पटना [जेएनएन]। शारदीय नवरात्र यूं तो देश-दुनिया में पूरी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता, लेकिन बिहार के राजघरानों में ऐतिहासिक ढंग से आज भी मां दुर्गा और मां काली की पूजा-आराधना की जाती है। बदलते परिवेश में जगह-जगह पूजा पंडालों का महत्व जरूर बढ़ा है, लेकिन डुमरांव, गिद्धौर, हथुआ, बनैली इस्टेट, दरभंगा महाराज, राजनगर, सीतामढ़ी, जैतपुर इस्टेट, कुरसैला इस्टेट आदि में आज भी पारंपरिक ढंग से पूजा-अर्चना की जाती है और पुरानी मान्यताएं कायम हैं। 

पटना के बंगाली अखाड़ा में आज भी होती है पारंपरिक पूजा

नवरात्र और दशहरा पर्व पर भव्य आयोजनों का गवाह रहा है। यहां मां दुर्गा की पूजा की परंपरा आजादी के पहले से है। शहर में हो रहे अनुष्ठान के सबसे पुराने स्थान का जिक्र करें तो लंगरटोली स्थित बंगाली अखाड़ा का नाम सबसे पहले आता है। जानकार बताते हैं कि 126 साल पहले यहां अंग्रेज अधिकारियों की प्रताड़ना से बचने के लिए स्वतंत्रता सेनानियों ने मां दुर्गा की प्रतिमा बिठाई थी। सालों बीतने के बाद भी यहां मां की आराधना का सिलसिला अनवरत जारी है।

बंगाली पद्धति से वर्षो से हो रही पूजा

कोलकाता के बाशिदों ने जब पटना में अपना ठिकाना बनाया तो राजधानी के रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा की जाने लगी। रंगकर्म निदेशक आलोक गुप्ता बताते हैं, पटना सिटी के मारूफगंज में 1940 के आसपास से बंगाली पद्धति से पूजा करने की शुरुआत हुई। इसके बाद लंगरटोली बंगाली अखाड़े में वर्ष 1893 के आसपास से अनुष्ठान आरंभ हुआ, जो आज भी जारी है।

स्वतंत्रता सेनानी बनाते थे रणनीति

पूजा समिति के अमित सिन्हा की मानें तो तो बंगाली अखाड़े का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा है। वर्ष 1893 के पूर्व यहां कुश्ती होती थी। जिसके कारण इसका नाम अखाड़ा पड़ा। बंगाली अखाड़े में स्वतंत्रता संग्राम के दीवाने जुटते थे और देश की आजादी के लिए रणनीति बनाते थे।

अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंकने के लिए दुर्गा मंदिर की स्थापना कर पूजा शुरू की गई थी। बंगाली पद्धति में धुनची नृत्य का काफी महत्व है। इस कारण यहां भी पूजा के दौरान धुनची नृत्य की प्रस्तुति होती है। दशमी तिथि को मां की विदाई और दही-चूड़ा खिलाने की परंपरा आज भी अनवर जारी है।

लंगरटोली में सात समंदर के पानी को एकत्र कर माता की पूजा का जाती है। पूजा के समय केले के पेड़ को माता की प्रतिमा के समीप रख अनुष्ठान किया जाता है। जिसे बांग्ला में ‘बोधन’ कहा जाता है।

पतसंडा शक्तिपीठ में विधिवत होती है पूजा 

जमुई के उलाई नदी के किनारे स्टेट का अंतिम किला है। किले के ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ वहां की दुर्गा पूजा का भी विशेष महत्व है। इस इलाके को पतसंडा भी कहा जाता है। यहां की दुर्गा इतनी जाग्रत हैं कि श्रद्धालुओं के बीच वे काली है कलकत्ते की, दुर्गा है पतसंडे की के रूप में प्रसिद्ध हैं।

यह बिहार के जागृत शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है। चार शताब्दी से भी पूर्व स्टेट के तत्कालीन चंदेल राजा ने अलीगढ़ स्थापत्य से जुड़े राजमिस्त्रियों को बुलाकर इस ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर का निर्माण कराया था। दशहरा के अवसर पर यहां के  मेले में कभी मल्ल युद्ध , तीरंदाजी, कवि सम्मेलन, नृत्य प्रतियोगिताओं आदि का आयोजन हुआ करता था। यहां मीना बाजार भी लगाए जाते थे।

हाल के वर्षों में इसकी जगह सर्कस, थिएटर आदि ने ले लिया है। इस मेले को चंदेल वंश के अंतिम महाराा प्रताप सिंह ने वर्ष 1996 मे नासृत घोषित कर दिया। उसके बाद भी पूजा का मूल स्वरूप आज भी सैकड़ों वर्ष पुराना ही बना हुआ है।

ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर की प्रतिमा का निर्माण बनारस के सुप्रसिद्ध मूर्तिकार राजकुमार द्वारा सात पवित्र नदियों की खुदाई कर वहां से लाई गई मिट्टी से किया जाता है। मंदिर में दो विधियों से पूजा करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। उनमें से पहले प्रकार में प्रथम पूजा से लेकर छह पूजा तक वैदिक विधि विधान से किया जाता है।

दूसरे में सप्तमी से नवमीं पूजा तक तांत्रिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। तंत्र पूजा करने के लिए पूर्व काल में बंगाल से महापंडित आते थे। लेकिन अब देवघर से आए तांत्रिक पंडित वह पूजा करते हैं। यहां प्रथम पूजा से ही मां को बलि की प्रथा चली आ है। नवमीं को इलाके के हारों लोग पाठा की बलि चढ़ाते हैं। महाराजा प्रताप सिंह द्वारा दशहरा पूजा संचालन व्यवस्था जनता के हाथों में सौंपे जाने के बाद वहां के ग्रामीणों द्वारा आमसभा कर कमेटी गठित कर पूजा व्यवस्था समिति बनाई जाती है।

राजनगर में तंत्र पद्धति से हुई प्रतिमा की स्थापना

शक्ति की पूजा में रियासत की अलग ही पहचान रही है। भगवती के परम भक्त, उपासक व तंत्र विद्या के ज्ञाता महाराजा रमेश्वर सिंह ने 18वीं सदी में राजनगर में तंत्र पद्धति से कई मंदिरों का निर्माण करवाया। इनमें राजनगर राज परिसर में स्थापित दुर्गा मंदिर का विशिष्ट महत्व है।

यह मंदिर रोमन, ब्रिटिश व भारतीय पुरातत्व तथा स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट नमूना है। महाराजाधिराज ने इस मंदिर में संगमरमर से बनी माता दुर्गा की दस भुजाओं वाली प्रतिमा स्थापित की थी। आज यहां राजपरिवार का कोई नहीं है, लेकिन नवरात्र में विशेष पूजा होती है।

 वीएसजे कॉलेज, राजनगर के प्रधानाचार्य सह इतिहासविद डॉ. हीरानंद आचार्य कहते हैं, यहां निशा पूजा के दिन भगवती के स्वरूप का निर्माण कर सहस्न छिद्र वाले कलश से अभिषेक का विशेष विधान है। इसे उदिष्ट पूजा कहते हैं। मंदिर के पुजारी शंभूनाथ झा कहते हैं कि नवरात्र में तंत्रोक्त व वेदोक्त दोनों पद्धतियों से पूजा होती है।

बेतिया में कालीबाग मंदिर और दुर्गाबाग मंदिर हैं विशेष

बेतिया के राजाओं ने कई शक्ति मंदिरों का निर्माण कराया। राज किला के पश्चिम निर्मित कालीबाग मंदिर एवं पूरब में स्थापित दुर्गाबाग मंदिर महत्वपूर्ण है। कालीबाग मंदिर का निर्माण 1676 में के महाराजा गज बहादुर सिंह ने कराया था। इसके दक्षिण में काली की प्रतिमा की दोनों दस महाविद्या एवं नवदुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित हैं। यह अन्यत्र नहीं पाई जातीं।

यहां माता के चौसठ रूपों की भी अलग-अलग प्रतिमाएं हैं। पहले मंदिर में माता की आराधना विशेष वादन से शुरू होती थी। प्रवेश द्वार पर निर्मित सिंह दरवाजा इसका गवाह है। वहां बना कमरा वादकों के बैठने के लिए था। पूजा तांत्रिक विधि से होती थी।

मंदिर के पुजारी जयचंद्र झा बताते हैं कि नवरात्र में प्रतिदिन छाग बलि की व्यवस्था रहती थी। प्रतिपदा को एक, द्वितीया को दो और ऐसे ही नवमी को नौ बलि देने की व्यवस्था थी। यह रस्म दीपावली तक बढ़ता जाता था। जानकार बताते हैं कि दीपावली की रात महिष बलि दी जाती थी।

शाम की आरती में नेपाल के राजा की ओर से दिया गया महाघंटा बजाया जाता था। राजा एवं महारानी इन मंदिरों में विशेष मुहूर्त पर पूजा करने जाते थे। महारानी के जाने के लिए राज किला से कालीबाग मंदिर तक सुरंग का निर्माण कराया गया था। राज का अब कोई नहीं, लेकिन नवरात्रों में विशेष पूजा आज भी होती है। यहां पर आसपास के अलावा राज्य के कई जिलों से श्रद्धालु मां के दर्शन को आते हैं।

ड्योढ़ी का दुर्गा मंदिर, जहां जाग्रत हैं मां दुर्गा

मुगलकाल से ही भागलपुर के चंपानगर स्थित महाशय राज परिवार द्वारा महाशय में की जा रही महिषासुर मर्दिनी की पूजा आसपास के जिलों में काफी प्रसिद्ध है। यहां की देवी काफी जाग्रत मानी जाती हैं। उनके दर्शन व मनौती मांगने के लिए दूर-दूर के हजारों श्रद्धालु मंदिर आते हैं।

मंदिर के वर्तमान सेवायत अरधेंदु घोष उर्फ पलटन घोष ने बताया कि लगभग 600 साल पूर्व गल बादशाह अकबर के शासन काल में उनके दरबार में कानूनगो महाशय श्रीराम घोष को यहां पूजा शुरू करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। तब से यहां उनकी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हर वर्ष उत्सवपूर्ण ढंग से यहां दुर्गा महारानी की पूजा करती आ रही है।

यहां प्रारंभिक काल से ही चार भुजा वाली देवी की विशाल प्रतिमा के साथ हर दिन पूजित छोटे आकार की अष्टधातु की दशभुजा दुर्गा की पूजा करने की परिपाटी चली आ रही है। इस मंदिर में देवी दुर्गा की प्रतिमा के ऊपर भगवान शिव की प्रतिमा को रखकर उनकी भी पूजा किए जाने की परंपरा है।

पूजा-आराधना के लिए करीब 10 दिन पूर्व बोधन के दिन ढोल-बाजे के साथ महाशय परिवार के सदस्य व पुरोहित नदी तट पर जाकर देवी को आमंत्रण देते हैं। बोधन से सप्तमी को उनकी प्रतिमा बिठाने, पूजा व विसर्जन तक की अवधि कुल 17 दिनों की होती है। राज परिवार का कोष सदा भरा रहे इस कामना से पूजा अवधि के प्रारंभ से ही कुबेर की भी पूजा करने व बोघन, चतुर्थी व षष्ठी को कौड़ी लुटाने की यहां अनूठी परंपरा चली आ रही है।

श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मंदिर से लुटी हुई कौड़ी घर में रखने से कुबेर का आशीर्वाद बना रहता है। 1इस अवसर पर ड्योढ़ी के विशाल मैदान में एक पखवाड़े तक मेला भी लगता है। पलटन घोष ने बताया कि गल बादशाह ने महाशय तारकनाथ घोष अकबरनामा में यहां दुर्गा महारानी, बटुक भैरव, वासुदेव रायजी व शिवजी महाराज की पूजा अर्चना के लिए उनके नाम से सुल्तानगंज से कहलगांव स्थित बटेश्वरस्थान की गंगा नदी व कई बाग-बगीचे की बंदोबस्ती की थी।

Posted By: Kajal Kumari

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