पटना, आनलाइन डेस्‍क। कभी बिहार में बड़े जनाधार वाली पार्टी रही कांग्रेस (Bihar Congress) को नए प्रदेश अध्‍यक्ष की तलाश है। प्रदेश अध्‍यक्ष डा. मदन मोहन झा (Dr. Madan mohan Jha) पहले ही पद से हटने की इच्‍छा जाहिर कर चुके हैं। कुछ समय पहले भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी (CPI) से कांग्रेस में धमाकेदार एंट्री करने वाले कन्‍हैया कुमार (Kanhaiya Kumar) को बिहार में पार्टी का बड़ा चेहरा माना गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) व भारतीय जनता पार्टी (BJP) के खिलाफ कन्‍हैया की राष्‍ट्रीय छवि को देखते हुए माना जा रहा था कि कांग्रेस को बिहार में राष्‍ट्रीय स्‍तर का नेता मिल गया है। लेकिन बिहार विधानसभा की दो सीटों पर हुए उपचुनाव (Bihar Assembly By-Election) के बाद से कन्हैया कुमार बिहार में राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं दिख रहे हैं। सवाल है कि क्‍या कन्‍हैया को पार्टी नया प्रदेश अध्‍यक्ष बना सकती है? बिहार में इन दिनों चल रही पिछड़ों की राजनीति में कन्‍हैया कांग्रेस के लिए कितने प्रासंगिक हैं?

बिहार में कांग्रेस का चेहरा बनने की थी उम्‍मीद

कन्‍हैया कुमार बीजेपी व खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की खिलाफत के लिए जाने जाते हैं। विपक्ष की राजनीति का आधार भी बीजेपी व पीएम मोदी का विरोध ही है। ऐसे में कांग्रेस को कन्‍हैया में अपनी सियासी रणनीति को धार देता बड़ा चेहरा नजर आया। पार्टी ने उन्‍हें तामझाम के साथ अपने पाले में किया। माना गया कि वे बिहार में कांग्रेस का चेहरा बनेंगे।

अब सक्रिय राजनीति से दूर दिख रहे कन्‍हैया

कांग्रेस में शामिल होने के बाद कन्‍हैया कुमार के पटना आने पर कांग्रेसियों ने उन्‍हें हाथोंहाथ लिया। उनका जोरदार स्वागत किया गया। कन्‍हैया ने भी दो सीटों पर हुए बिहार विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस की तरफ से प्रचार किया। हालांकि, उपचुनाव में कांग्रेस की हार हुई। इसके बाद से वे बिहार कांग्रेस में सक्रिय नहीं दिख रहे हैं।

बिहार में इन दिनों पिछड़ों की राजनीति हावी

सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्‍यों? कन्‍हैया अगड़ी जाति (Upper Caste) से ताल्‍लुक रखते हैं। वे बिहार की राजनीति में अहम भूमिका निभाती रही भूमिहार (Bhumihar) जाति से आते हैं। युवा व तेज-तर्रार तो हैं हीं। इसके बावजूद बिहार में इन दिनों चल रही पिछड़ों की राजनीति को भी नजरअंदाज करना मुश्किल है। नाम नहीं देने के आग्रह के साथ एक वरिष्‍ठ कांग्रेसी नेता ने कहा कि आलाकमान का फैसला अंतिम होगा, लेकिन पिछड़ों की राजनीति के बीच सवर्ण कन्हैया को प्रदेश अध्‍यक्ष या पार्टी का चेहरा बनाने का जोखिम लेना कठिन है। इसके पहले भी कांग्रेस ने सवर्ण डा. मदन मोहन झा को प्रदेश अध्‍यक्ष बनाया, लेकिन इससे कोई खास उपलब्धि नहीं मिल सकी।

राष्‍ट्रवाद के नाम पर बीजेपी को मिलेगा मौका

कन्‍हैया पर एक सवाल बीजेपी द्वारा बनाई गई उनकी देशविरोधी छवि (Anti National Image) को लेकर भी है। कांग्रेस द्वारा कन्‍हैया को प्रदेश कांग्रेस की कमान देने पर बीजेपी को राष्‍ट्रवाद (Nationalism) के नाम पर कांग्रेस को घेरने का अवसर मिलेगा।

कांग्रेस व महागठबंधन में भी आसान नहीं राह

कन्‍हैया के लिए दल की आंतरिक राजनीति से भी जूझना तय है। बिहार कांग्रेस में सवर्ण, खासकर उनकी ही भूमिहार जाति के कई बड़े नेता हैं। कन्हैया को उनसे पार पाना आसान नहीं है। कांग्रेस के बाहर महागठबंधन (Mahagathbandhan) में भी राहें मुश्किल भरी हैं। युवा कन्‍हैया की तेज-तर्रार छवि कहीं बिहार विधासभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) की राह में रोड़ा न बन जाए, इसे राष्‍ट्रीय जनता दल के अध्‍यक्ष लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad yadav) कभी नहीं चाहेंगे। कांग्रेस भी फिलहाल आरजेडी को नाराज करने की स्थिति में नहीं है।

फिलहाल कहीं चर्चा में नहीं है कन्‍हैया का नाम

ऐसे में कन्‍हैया भले ही राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की सहमति के बाद पूरे तामझाम के साथ कांग्रेस में शामिल हुए हों, लेकिन बिहार कांग्रेस में उनकी राह आसान नहीं दिख रही है। ऐसे में आश्‍चर्य नहीं कि प्रदेश कांग्रेस अध्‍यक्ष की खोज में कन्‍हैया के नाम की चर्चा नहीं हो रही है। अब अंदर ही अंदर कोई सियासी खिचड़ी पक रही हो ताे और बात है।

Edited By: Amit Alok