बेटे की लंबी उम्र के लिए गाया जाता है यह खास गीत, जितिया आते ही बिहार में गूंजता है 'जुग-जुग जिए मोर बबुआ दुलरुआ'
जितिया व्रत बिहार में मां की ममता, आस्था और लोक परंपरा का पर्व है, जहां लोकगीतों में बच्चों की लंबी ...और पढ़ें

गीतों में सुनाई देती है मां के दिल की आवाज
HighLights
जितिया व्रत मां की ममता और लोक परंपरा का पर्व।
"जुग-जुग जिए मोर बबुआ दुलरुआ" जैसे गीत प्रमुख।
चील-सियारिन की कथा से जुड़ी है लोक आस्था।
डिजिटल डेस्क, पटना। बिहार में जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत सिर्फ उपवास और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि मां की ममता, आस्था और लोक परंपरा से जुड़ा खास अवसर है। जितिया आते ही गांव-घर का माहौल लोकगीतों की मिठास से भर जाता है।
इन गीतों में मां की सबसे बड़ी कामना झलकती है, उसका लाल हमेशा स्वस्थ रहे और लंबी उम्र पाए। यही भाव “जुग-जुग जिए मोर बबुआ दुलरुआ” जैसे पारंपरिक सोहर और आशीर्वाद गीतों में सुनाई देता है।
चील-सियारिन की कथा में छिपी है लोक आस्था
जितिया व्रत की कथा में चील और सियारिन का खास महत्व है। बिहार में माताएं इस पारंपरिक कथा को केवल सुनाती ही नहीं, बल्कि कई जगह इसे लोकधुनों में गाकर भी प्रस्तुत करती हैं।
कथा गीतों में चील और सियारिन के प्रसंग के जरिए व्रत की महत्ता, नियम और आस्था की बातें सामने आती हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी ग्रामीण बिहार में जीवंत है।
गीतों में सुनाई देती है मां के दिल की आवाज
जितिया के मौके पर जब महिलाएं सामूहिक रूप से लोकगीत गाती हैं तो माहौल पूरी तरह भक्तिमय और भावुक हो जाता है। गीतों में बेटे की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की जाती है।
बदलते दौर में भी इन गीतों की लोकप्रियता कम नहीं हुई है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के दौर में भी जितिया के लोकगीत बिहार की लोक-संस्कृति और मातृत्व की भावनाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं।
