जिउतिया 2026: 3 अक्टूबर को निर्जला व्रत, 4 अक्टूबर को पारण; बेटे को दें ये 5 शुभ चीजें टल जाएगी हर अनहोनी
संतान की सुख-समृद्धि और दीर्घायु के लिए माताएं 3 अक्टूबर को निर्जला जिउतिया व्रत रखेंगी, जिसका पारण 4 अक्टूबर को ...और पढ़ें

जिउतिया पर्व
HighLights
माताएं 3 अक्टूबर को संतान की दीर्घायु के लिए निर्जला व्रत रखेंगी।
2 अक्टूबर को सरगही से विधान शुरू होकर 4 अक्टूबर को पारण होगा।
बच्चों को रक्षा सूत्र, नए वस्त्र, खीरा, खिलौने, अकुरी प्रसाद दें।
जागरण संवाददाता, पटना। संतान की सुख-समृद्धि, दीर्घायु और यशस्वी जीवन की कामना से माताएं तीन अक्टूबर, शनिवार को जिउतिया व्रत रखेंगी। आश्विन कृष्ण अष्टमी को आर्द्रा नक्षत्र और वरीयान योग में महिलाएं दिनभर अन्न-जल का त्याग कर भगवान जीमूतवाहन की पूजा करेंगी।
इस दौरान व्रत कथा का श्रवण भी किया जाएगा। मिथिला और बनारसी, दोनों पंचांगों के अनुसार इस बार जिउतिया व्रत की अवधि 24 घंटे रहेगी।
दो अक्टूबर से शुरू होगा तीन दिवसीय जिउतिया विधान
ज्योतिषाचार्य राकेश झा के अनुसार जिउतिया का विधान तीन दिनों तक चलता है। इसकी शुरुआत दो अक्टूबर, शुक्रवार को सरगही अथवा ओठगन से होगी।
इसके अगले दिन तीन अक्टूबर को माताएं निर्जला उपवास रखेंगी। धार्मिक अनुष्ठान के बाद चार अक्टूबर, रविवार को सुबह 7:38 बजे के बाद पारण किया जाएगा। इस दौरान व्रती महिलाएं पूरे नियम और संयम के साथ व्रत का पालन करेंगी।
बिहार समेत इन राज्यों में अलग-अलग नामों से प्रसिद्ध
जिउतिया पर्व बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में विशेष रूप से मनाया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसे जिउतिया, जितिया, जीवित्पुत्रिका और जीमूतवाहन व्रत के नाम से जाना जाता है।
पर्व के केंद्र में संतान की रक्षा, दीर्घायु और मंगलकामना की भावना रहती है। इस कारण माताओं के बीच इसका विशेष धार्मिक और पारिवारिक महत्व माना जाता है।
जितिया पर बच्चों को दें ये 5 चीजें, रक्षा सूत्र से प्रसाद तक
पवित्र रक्षा सूत्र
पूजा के बाद बच्चों की कलाई में लाल या पीले रंग का सूती धागा बांधना शुभ माना जाता है। इसे संतान की मंगलकामना से जोड़ा जाता है।
नए कपड़े
जितिया पर बच्चों को नए वस्त्र देना भी शुभ परंपरा मानी जाती है। पूजा के बाद उन्हें बड़ों का आशीर्वाद दिलाया जाता है।
खीरा
जितिया में खीरे का विशेष महत्व है। पूजा के बाद इसे बच्चों को प्रसाद के रूप में दिया जा सकता है।
खिलौने
छोटे बच्चों को उनकी पसंद का खिलौना देकर पर्व की खुशी साझा की जा सकती है। इसे संतान की प्रसन्नता से जोड़कर देखा जाता है।
अकुरी का प्रसाद
पूजा के बाद बच्चों को अकुरी का प्रसाद दिया जाता है। इससे पर्व की पारंपरिक मिठास भी बच्चों तक पहुंचती है।
श्रीकृष्ण ने बचाया था उत्तरा के गर्भस्थ शिशु को
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा में अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु पर अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र चला दिया था।
उत्तरा ने भगवान श्रीकृष्ण से गर्भस्थ संतान की रक्षा की प्रार्थना की। मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने अपने तेज और पुण्य के प्रभाव से गर्भस्थ शिशु को जीवन प्रदान किया। इसी प्रसंग से संतान की रक्षा और दीर्घायु की कामना से जीवित्पुत्रिका व्रत की परंपरा जुड़ी मानी जाती है।
चील-सियारिन की कथा देती है व्रत-निष्ठा का संदेश
जिउतिया की लोककथा में चील और सियारिन के व्रत उल्लंघन तथा उनकी संतानों की अकाल मृत्यु का प्रसंग आता है।
धार्मिक व्याख्या में इस कथा को ईर्ष्या और द्वेष जैसी प्रवृत्तियों से बचने का संदेश माना जाता है। साथ ही यह संतान के प्रति स्नेह, जिम्मेदारी और संरक्षण की भावना को भी रेखांकित करती है। इसी वजह से जिउतिया की कथा पर्व की धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
तीन दिनों में ऐसे पूरा होगा जिउतिया व्रत
- सरगही/ओठगन: दो अक्टूबर, शुक्रवार
- निर्जला जिउतिया: तीन अक्टूबर, शनिवार
- पारण: चार अक्टूबर, रविवार, सुबह 7:38 बजे के बाद
- व्रत अवधि: मिथिला और बनारसी पंचांग के अनुसार 24 घंटे
