बिहार के गांवों में 8992 ‘डॉक्टर दीदियां’, पशुओं का इलाज और पशुपालकों की आय बढ़ाने में जुटीं
बिहार में जीविका दीदियां 'पशु सखी' के रूप में गांवों में पशुओं की प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल कर रही हैं। यह ...और पढ़ें

पशुपालकों के लिए जीविका दीदियां बन रहीं सहारा। सौ- आईपीआरडी
HighLights
बिहार में 8,992 'पशु सखियां' पशुओं की देखभाल कर रहीं।
पशु सखियां टीकाकरण, कृमिनाशक दवाओं पर सलाह देती हैं।
ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर मिल रहे हैं।
राज्य ब्यूरो, पटना। बिहार के गांवों में जीविका दीदियां अब पशुओं की सेहत सुधारने के साथ पशुपालकों की आय बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभा रही हैं।
प्रशिक्षित ‘पशु सखियां’ पशुओं की प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, टीकाकरण, कृमिनाशक दवाओं के उपयोग और संतुलित आहार के संबंध में सलाह देकर पशुधन के संरक्षण में मदद कर रही हैं।
राज्य के विभिन्न जिलों में कुल 8,992 पशु सखियां सेवाएं दे रही हैं। जीविका की इस पहल से ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार के अवसर बढ़े हैं।
वहीं, पशुपालकों को गांव में ही पशुओं की प्राथमिक देखभाल और जरूरी सलाह मिल रही है। जिलेवार आंकड़ों के अनुसार, गया में सर्वाधिक 540 पशु सखियां कार्यरत हैं।
मुजफ्फरपुर में 443, कटिहार में 432, नवादा और पूर्णिया में 430-430 तथा नालंदा में 424 पशु सखियां सेवाएं दे रही हैं।
प्रशिक्षण से आत्मनिर्भरता तक का सफर
पशु सखी के रूप में महिलाओं की सफलता की एक मिसाल लखीसराय जिले के चानन प्रखंड की ईंटोन पंचायत स्थित मननपुर गांव की खुशबू कुमारी हैं।
इंटरमीडिएट उत्तीर्ण खुशबू वर्ष 2019 में जीविका के स्वयं सहायता समूह से जुड़ी थीं। उन्होंने खेती में निवेश के लिए समूह से एक लाख रुपये का ऋण लिया।
इससे खेती के जरिए उन्हें प्रतिवर्ष 40 से 50 हजार रुपये तक मुनाफा होने लगा। उनकी सक्रियता को देखते हुए वर्ष 2023 में पशु सखी के रूप में चयन किया गया।
जीविका से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद वह गांव-गांव जाकर पशुओं की देखभाल और पशुपालकों को जागरूक करने लगीं।
खुशबू विशेष रूप से बकरीपालकों को स्वास्थ्य निगरानी, कृमिनाशक दवाओं के उपयोग, विटामिन और प्राथमिक उपचार की जानकारी देती हैं।
साथ ही पीपीआर और ईटी जैसी बीमारियों से बचाव के लिए टीकाकरण के प्रति जागरूक करती हैं। उनके प्रयासों से पशुपालकों में बकरियों की देखभाल को लेकर जागरूकता बढ़ी है और उनकी मृत्यु दर कम करने में मदद मिली है। ग्रामीण महिलाएं उन्हें स्नेह से ‘डॉक्टर दीदी’ कहती हैं।
पशुधन की सुरक्षा से आय बढ़ाने में मदद
ग्रामीण बिहार में पशुपालन अनेक परिवारों की आजीविका का प्रमुख आधार है। पशुओं के बीमार होने या समय पर उपचार नहीं मिलने से पशुपालकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
ऐसे में प्रशिक्षित पशु सखियां बीमारियों की पहचान, समय पर टीकाकरण, कृमिनाशक दवाओं और संतुलित आहार के बारे में सलाह देकर नुकसान कम करने में मदद कर रही हैं।
स्थानीय स्तर पर इनकी उपलब्धता से पशुपालकों को शुरुआती देखभाल और जरूरी मार्गदर्शन के लिए सहायता मिलती है। इससे पशुधन के संरक्षण के साथ पशुपालन को अधिक लाभकारी बनाने की संभावनाएं बढ़ती हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ताकत हैं जीविका दीदियां : श्रवण कुमार
ग्रामीण विकास विभाग एवं सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि जीविका दीदियां अपनी मेहनत, लगन और दृढ़ इच्छाशक्ति से परिवारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ ग्रामीण समाज के विकास में भी योगदान दे रही हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और गरीब परिवारों तक वित्तीय एवं तकनीकी सहायता पहुंचाना है।
पशु सखी मॉडल के जरिए गांवों में पशुओं की प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, टीकाकरण और जरूरी सलाह उपलब्ध हो रही है। इससे पशुधन संरक्षण और पशुपालकों की आय बढ़ाने की संभावनाएं मजबूत हो रही हैं।
मंत्री ने कहा कि जीविका के माध्यम से महिलाओं को प्रशिक्षण और आजीविका के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें और बिहार के ग्रामीण विकास में अपनी भूमिका निभा सकें।
सर्वाधिक पशु सखियों वाले 10 जिले
| जिला | पशु सखियों की संख्या |
|---|---|
| गया | 540 |
| मुजफ्फरपुर | 443 |
| कटिहार | 432 |
| नवादा | 430 |
| पूर्णिया | 430 |
| नालंदा | 424 |
| रोहतास | 423 |
| पटना | 387 |
| सीतामढ़ी | 377 |
| पश्चिमी चंपारण | 372 |
जीविका की यह पहल ग्रामीण महिलाओं को रोजगार और पहचान देने के साथ पशुधन संरक्षण को भी मजबूती दे रही है। प्रशिक्षण और संस्थागत सहयोग के जरिए ये ‘डॉक्टर दीदियां’ गांवों में पशुपालन को बेहतर बनाने और ग्रामीण परिवारों की आर्थिक सुरक्षा मजबूत करने में योगदान दे रही हैं।
