पटना [ प्रमोद पांडेय ]। राजनीति में एक और एक का मतलब न हमेशा दो होता है न ग्यारह। समीकरण परिस्थितियों और राजनीतिक माहौल के मुताबिक बनते-बिगड़ते रहते हैं। कब परिस्थिति बदल जाए यह भी तय नहीं होता। पिछले साल जब बिहार में चुनाव था तब नीतीश तथा लालू महागठबंधन की तैयारी के दौरान सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की ओर देख रहे थे। आज मुलायम बिहार की ओर टकटकी लगाए हैं।

कभी नीतीश और लालू उनका नेतृत्व स्वीकारने को तैयार थे लेकिन बदले माहौल में क्या होगा यह कहना कठिन है। नीतीश के नेतृत्व वाले जदयू ने तो उल्टा संकेत देने शुरू कर दिए हैं। जदयू का कहना है कि बदले राजनीतिक माहौल में पार्टी पूरी तरह सोच विचार करेगी। पहले श्याम रजक और अब पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने कह दिया है कि सपा में रार खत्म होने का पार्टी इंतजार करेगी। अनुभव ने बहुत कुछ सिखा दिया है।

जानकारों के मुताबिक मुलायम के प्रस्ताव को लेकर जदयू की ओर से आ रही प्रतिक्रिया का सीधा-सा मतलब यही है कि वर्तमान माहौल में नीतीश मुलायम के इस प्रस्ताव के साथ आंखें मूंदकर जाने को तैयार नहीं। उन्होंने निमंत्रण नहीं मिलने की बात कहकर एेसी जमीन तैयार कर दी जिसपर जदयू के दूसरे क्षत्रप लाठी भांजने लगे हैं। जदयू नेता वशिष्ठ नारायण सिंह और श्याम रजक की बातों से जो संकेत निकलता है वह यही है।

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तब मुलायम की हो रही थी चिरौरी

बिहार में विधान सभा चुनाव का परिदृश्य याद करें तो साफ है कि तब मुलायम के अड़ने के कारण ही नीतीश और लालू का महागठबंधन का खाका धरातल पर नहीं उतर सका। तब भाजपा से सहमे नीतीश और लालू उनसे जनता परिवार का नेतृत्व करने की चिरौरी तक कर रहे थे। मुलायम में प्रस्ताव ठुकराया तो जनता परिवार को एकजुट करने का नीतीश और लालू का सपना टूट गया।

लेकिन इस दौरान एकजुटता की कोशिशों में बहुत आगे बढ़ चुके नीतीश और लालू एक होकर लड़े। सत्ता कब्जे में रही। राजद भले ही सबसे बड़ा दल बना लेकिन नीतीश की मुख्यमंत्री की कुर्सी बरकरार रही। हां, इस घटनाक्रम मुलायम से नीतीश की राजनीतिक दूरी बढ़ा दी। सपा प्रमुख से खार खाए नीतीश ने यूपी में चुनाव को लेकर सपा के खिलाफ मोर्चे की जमीन तैयार करनी शुरू की। तब तक मुलायम पूरी तरह निश्चिंत थे।

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कुनबे को बचाने की पहले से जुड़ी है कवायद

इसी दौरान समाजवादी पार्टी में कलह की स्थिति बनी तो कुनबे की लड़ाई रोकने की कवायद में जुटे मुलायम को जनता परिवार को एकजुट करने के प्रस्ताव की याद आई। मुलायम को लगा कि अब अगर कोशिश नहीं हुई तो सपा कमजोर हो जाएगी। पार्टी की रजत जयंती के बहाने महागठबंधन की जमीन तैयार करने के लिए जनता परिवार को एकजुट करने का उनका प्रयास इसी दिशा में है।

कमजोर मुलायम को घास डालने से परहेज कर रहा जदयू

लेकिन अब इसमें पेंच फंस गया है। नीतीश जान रहे हैं कि मुलायम अब पहले जितने ताकतवर नहीं रहे। बेटे और भाई के बीच सुलह की उनकी कोशिश में अखिलेश के मजबूत होने के बावजूद यह साफ हो गया है कि मुलायम सिंह यादव इस लड़ाई में कमजोर हुए हैं। मुलायम से दूरी के बावजूद नीतीश अपनी रणनीति के तहत खुद को अखिलेश के साथ खड़ा दिखाते रहे हैं। ताकि तीसरे मोर्चे की संभावना भी रहे और उन्हें चुनौती भी नहीं मिले।

लालू के लिए आसान नहीं होगा प्रस्ताव से किनारा

लालू और उनके उपमुख्यमंत्री बेटे तेजस्वी शुरू से सपा को समर्थन और उसी पार्टी के लिए प्रचार की बात कहते रहे हैं। लेकिन लालू परिवार के लिए सपा का मतलब अब भी अखिलेश यादव नहीं बल्कि मुलायम सिंह यादव हैं। बाप-बेटे के बीच खींचतान में बाप को दरकिनार कर बेटे का साथ देना लालू के लिए यूं भी असंभव है। एेसे में लालू अगर मुलायम के साथ हो भी लें तो नीतीश इतनी आसानी से उनके साथ नहीं जाएंगेै।

जनता परिवार को एकजुट करने की मुलायम की कवायद को लेकर जदयू नेताओं के बयान का मतलब यही है कि पार्टी नेतृत्व कमजोर मुलायम के साथ जाने की पक्षधर नहीं। इसीलिए वह मुलायम के प्रस्ताव को स्वीकार करने से कन्नी काटने लगा है। जदयू के इस स्टैंड ने किसी न किसी रूप में लालू परिवार को भी बेचैनी में डाला है। मुलायम के प्रस्ताव को नीतीश अगर खारिज करते हैं तो यह लालू के लिए भी असहज स्थिति होगी।

यूपी के चुनाव को लेकर वहां धड़ाधड़ राजनीतिक बैठकें कर रहे नीतीश ने खुलकर सपा के साथ जाने की बात कभी नहीं कही। समाजवादी पार्टी के विवाद के दौर में भी नीतीश और उनके दल ने अखिलेश को समर्थन के लिए शराबबंदी की शर्त रखी है जबकि मुलायम सिंह यादव के साथ के राजनीतिक संबंधों को उनके साथ पारिवारिक रिश्तों में बदल चुका लालू और उनके परिवार के लिए मुलायम सिंह यादव को दरकिनार करना मुश्किल है।

लालू अब नीतीश को साधने की कोशिश में

राजनीतिक प्रेक्षकों की मानें तो नीतीश कुमार के निमंत्रण पर पूरे लालू परिवार के शनिवार को उनके यहां भोजन पर जाना और इसी दौरान सपा के प्रस्ताव को लेकर जदयू नेताओं की प्रतिक्रिया आना महज संयोग नहीं है। किसी न किसी रूप में इसका सपा प्रमुख मुलायम के प्रस्ताव से भी जुड़ाव है और जानकारों की मानें तो सपा प्रमुख के प्रस्ताव पर लालू कुनबा नीतीश को मुलायम करने में जुटा है।

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