पटना, राज्य ब्यूरो। जदयू के उपाध्यक्ष बनने के बाद यह प्रशांत किशोर की पहली रणनीतिक जीत थी। यह उनकी पहली परीक्षा भी थी, जिसमें वे पास हो गए। अगर हार होती तो पीके के लिए दल मेंं रहना दुश्वार हो जाता। जीत गए हैं सो विरोधी भी सराह रहे हैं। जदयू की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि 13 साल सत्ता में रहने के बावजूद उसका छात्र संगठन विश्वविद्यालय परिसर में लगभग वनवास ही झेल रहा था।

बड़े पुराने दलों के छात्र संगठनों के सामने उसकी हैसियत कुछ नहीं थी। पटना विवि में भी बमुश्किल काउंसिलर के कुछ पदों पर जीत हो पाती थी। इसबार उसे अध्यक्ष के साथ कोषाध्यक्ष का भी पद मिल गया। 

असल में पहली बार जदयू का छात्र संगठन नियोजित ढंग से और मुददों से लैस होकर छात्रों के बीच गया। विधान परिषद के सदस्य प्रो रणवीर नंदन को छात्र संगठन की जिम्मेवारी दी गई। उस समय तक पीके दृश्य से बाहर थे। रणवीर ने जिलों के अलावा विश्वविद्यालय मुख्यालय पर छात्र जदयू का सम्मेलन कराया।

पटना में जेपी की जयंती पर बड़े छात्र समागम का आयोजन किया। उसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ पीके भी शामिल थे। उस भीड़ ने छात्र जदयू को आगे बढऩे का हौसला दिया। रणवीर नंदन कहते हैं-यह शुरुआत है। अच्छी शुरुआत कह सकते हैं। हमारा लक्ष्य छात्र जदयू को सबसे बड़ा छात्र संगठन बनाना है।

पीयू को सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा और स्टूडेंटस क्रेडिट कार्ड के अलावा शिक्षा के क्षेत्र में किए गए नीतीश कुमार के कार्यों को प्रचार का मुददा बनाया गया। जीत की एक वजह अध्यक्ष मोहित प्रकाश का अपना प्रभाव भी है।

यह प्रभाव इससे भी जाहिर होता है कि छात्र जदयू के पैनल के दूसरे उम्मीदवारों को मोहित के बराबर वोट नहीं मिले। इसका मतलब यह है कि मोहित को छात्र जदयू के समर्थकों का तो पूरा वोट मिला,लेकिन वह अपने प्रभाव के वोटों को पैनल के दूसरे उम्मीदवारों के पक्ष में ट्रांसफर नहीं करा पाए। यह होता तो सभी पदों पर छात्र जदयू की जीत हो जाती।

बहरहाल, भारी विवाद के बावजूद पीके ने खुद को साबित कर दिया। वह लोकसभा और विधानसभा चुनावों की तरह छात्र संघ के चुनाव के लिए बेहतर रणनीतिकार हैं। व्याख्या होती रहेगी। लेकिन जीत तो हर हाल में जीत ही है।

Posted By: Kajal Kumari