पटना [अंकिता भारद्वाज]। महिला आयोग का दफ्तर गुरुवार को 'शादी वाला घर' लग रहा था। अध्यक्ष दिलमणी देवी मां की तरह बेटी की बरात की अगवानी में जुटी थीं। शाम पांच बजे विशाल बरात लेकर आयोग के दफ्तर पहुंचा। उत्कर्षा दरवाजे की ओट से ही टकटकी लगाए शर्माते हुए उसे निहार रही थी।

विधि विधान के साथ अध्यक्ष के दफ्तर में जयमाल की रस्म अदा हुई। विशाल ने उत्कर्षा की मांग सिंदूर से भरी और गले मंगलसूत्र पहनाया तो हॉल तालियों की गडग़ड़ाहट से गूंज उठा। मिठाइयां बंटी और थोड़ी देर बाद आयोग की सदस्यों ने 'बेटी' उत्कर्षा को विशाल के साथ विदा कर दिया।

विशाल और उत्कर्षा के जीवन में खुशी का ये लम्हा लंबी जुदाई और संघर्ष के बाद आया। दोनों सासाराम के रहने वाले हैं। घर आसपास ही है। दोनों के बीच एक दशक से अधिक समय से प्रेम-प्रसंग चल रहा था। विशाल मध्यप्रदेश के सतना में लोको पायलट है।

नौकरी लगने के बाद जब उत्कर्षा ने अपने घर वालों के सामने विशाल से शादी करने की इच्छा जताई तो वे बिफर गए। जवाब मिला, हम दूसरी जाति के लड़के से शादी नहीं करवा सकते। विशाल के लिए उत्कर्षा का प्रेम देखकर घर वालों ने पहरा लगा दिया। वह दो महीने तक कमरे में कैद रही। कमरा केवल खाना देने के लिए ही खुलता था।

सहेली ने दी आयोग को सूचना

उत्कर्षा की सहेली ने महिला आयोग को उसकी बदहाल स्थिति के बारे में बताया। सूचना मिलते ही आयोग ने सासाराम पुलिस-प्रशासन को पत्राचार कर उत्कर्षा को रिहा कराने का निर्देश दिया। जब पुलिस पहुंची तो घर वाले ड्रामा करने लगे, लेकिन उत्कर्षा बालिग थी, इसलिए पुलिस के सामने उनकी एक न चली।

आयोग के निर्देशानुसार पुलिसकर्मियों ने उत्कर्षा को मुक्त कराकर पटना स्थित कार्यालय पहुंचा दिया। यहां आने के बाद उत्कर्षा ने विशाल को कॉल किया और आयोग में लिखित आवेदन देकर प्रेम विवाह कराने का अनुरोध किया।

आयोग ने उत्कर्षा के अभिभावकों से संपर्क किया, लेकिन वह समझाने के बावजूद अंतरजातीय विवाह के लिए राजी नहीं हुए। अंत में आयोग के निर्देश पर विशाल परिजनों के साथ बरात लेकर महिला आयोग पहुंचा, जहां दोनों ने एक दूसरे को पति-पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। 

Posted By: Ravi Ranjan

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