मालिनी अवस्‍थी। Happy Mother's Day 2021 मातृत्व प्राप्त कर स्त्री देवत्व को प्राप्त कर लेती है क्योंकि सृजन की शक्ति ईश्वरीय देन है। सोचकर देखिए, एक स्त्री के कितने रूप हैं! ममता के ओज से दमकती, स्नेह का आंचल पसारती, संघर्ष के तप से प्रदीप्त। कामिनी प्रेयसी वही, तो अभिमानिनी पत्नी वही, दुहिता वही तो धारिणी भी वही। गृहस्थी की रीढ़, खेतों में अथक परिश्रमी वीर भी वही और वीर-प्रसूता भी वही। लोकसंस्कृति उसी के दम से है और वही परंपराओं की वाहिका है, वही उनकी संरक्षिका।

आदिकाल से स्त्री की जीवंतता ने लोक को कुछ इस तरह समृद्ध किया है कि हर लोकगीत में नारी के विविध रूप देखने को मिलते हैं, लेकिन इन सबमें सबसे मधुर और गहन हैं वे लोकगीत जिनमें स्त्री एक मां के रूप में दिखाई देती है। जिस संस्कृति में धरती, नदियों और धेनु को मां के समकक्ष माना जाता है, सहज ही समझा जा सकता है कि वहां मां का स्थान ईश्वर के समकक्ष माना गया और हमारे पारंपरिक लोकगीत इसके अनुपम साक्षी हैं। लगभग सभी संस्कारगीतों में मां की उपस्थिति अनिवार्य ही है। मां बनना स्त्री अपना सबसे बड़ा सौभाग्य मानती है। एक लोकगीत में सास-बहू के वार्तालाप के माध्यम से यह भाव समझा जा सकता है। यह लोकगीत वास्तव में एक मां का दूसरी मां से संवाद है- ‘मछियाई बैठी रे सासू रे बहुआ से पुछेलि हो/बहुआ कउन कउन तप कइलु ललन बड़ा सुन्नर हो।।/ माघही गंगा नहइली अगिनि नाहीं तपेली हो/ सासू बरत रहीला अवतार ललन बड़ा सुंदर हो।।’

सोहर बधाई गीतों में ‘लाल मोरे खेलैं अंगनैया’ गाती मां की उमंग भी दिखती है, तो ‘बाबा-आजी के मारे उछाह, ननद रानी भरे अंकवार, मोरे होरिल भये’ गाती मां के भीतर भविष्य की सुनहरी आस और कुल परिवार को संजोकर रखने का विश्वास परिलक्षित होता है। यदि मां के हृदय में वात्सल्य का उमड़ता सागर है तो वहीं एक जागरूक मां की चेतना भी। यह बात हम कुछ उदाहरणों से समझ सकते हैं। इस गीत को देखें- छोटा बालक घर से बाहर खेलने जा रहा है और विकल मां के हृदय की तुलना कुम्हार के आवां से की गई है। जिस तरह कुम्हार का आवां भीतर ही भीतर रह-रहकर धधक उठता है, उसी तरह मां का हृदय अपने लाल के लिए विकल हो उठता है।

‘कमर में सोहे करधनियां पांव पैजनियां/ ललना दूरि खेलन जनि जाहू, ढूंढन हम न अउबै।/ भोर भये भिनसरवा कलेनवा की जुनिया/ होइ गै कलेनवा की बेर ललन नहि आए।/ छाड़ेऊं में सातों बिरनवा बाप कै नैहर/ छोड़िब हरि की सेजरिया, ढूंढन हम आइन।/ जइसे कुम्हार क आवां त भभकि-भभकि रहै/ बेटा, वैसइ माई क करेजवा त धधकि-धधकि रहै।।’इस एक उपमा ने मां के भीतर की ज्वाला को ऐसी अद्भुत व्यंजना दी है जो कल्पना से परे है।

दूसरी ओर एक अन्य सोहर देखें जिसमें संतान की कामना रखने वाली माता अपने पुत्र को देशसेवा के लिए अर्पित करने में ही सौभाग्य मानती है। यह गीत इस दृष्टि से कालजयी है कि भारतवर्ष में माताओं ने लोककल्याण को सर्वोपरि रखा और वे ऐसी संतान जन्मने की साध रखती हैं जो देश की सेवा को अर्पित हो। ‘सून लागै दिया बिनु मंदिर मांग सेनुर बिनु हो/ललना ओइसन सून तिरिया गोद एक बालक बिनु हो।/पुतवा के देबों भारत मैया के, मतवा के सेउवा मा हो/ललना पूत करीहें देसवा कै काम, त जनम सुफल होइहै हो।।’

लोकगीत जनसाधारण की सरल अभिव्यक्तियां हैं। इनमें सूर-तुलसी जैसा साहित्य-बोध भले ही न हो किंतु इनकी अनुभूति इतनी गहरी है कि इन लोकगीतों के समक्ष साहित्य का लालित्य भी फीका पड़ जाता है। आज इन गीतों की पुनव्र्याख्या आवश्यक है। देशसेवा का निश्चय ठाने मां की मातृत्वचेतना का इससे सुंदर उदाहरण और क्या होगा? लोकगीतों में चित्रित मां के विविध रूप देख मन श्रद्धावनत हो जाता है।

गीतों में मां के सभी भाव दिखते हैं। एकाकी मां की उद्विग्नता सीता के माध्यम से इंगित की गई। वन में लव -कुश को जन्म देते समय नवप्रसूता मां सीता को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा होगा, इसकी कल्पना ग्रामगीत बन मुखर हो उठा। ‘कुस कै आढ़न कुस डासन बन फल भोजन/सीता लकड़ी कै कइली अंजोर संतति मुख देखलीं।।’ वन में अकेली सीता जंगल की लकड़ी खुद ही बीनकर आग जलाती हैं और उसी के उजाले में अपनी जुड़वां संतान का मुख देखती हैं। एक अन्य लोकगीत में वन में रह रहीं सीता जी को लक्ष्मण बुलाने जाते हैं तो सीता कहती हैं, ‘लक्ष्मण, तुम अपने घर जाओ, मैं वापस नहीं जाऊंगी। मेरे पुत्र जीएंगे तो जिन राम ने बुलाया है, उन्हीं के कहलाएंगे।’ ‘जाहु लछमन घर अपने त हम नहीं जाइब/मोरे जीअइ नंदलाल त उनके कहइहै।।’

वहीं दूसरी ओर कौशल्या उन सभी मातृत्व आकांक्षाओं और आशाओं की प्रतीक बन गईं जिन्हें हर स्त्री अनुभव कर सकती थी, करना चाहती थी। वन गए राम, लक्ष्मण और सीता की प्रतीक्षारत माता उनकी कुशलता की कामना कर रही हैं और अयोध्या लौटने को कह रही हैं- ‘मोरे राम के भीजे मुकुटवा/ लछिमन के पटुकवा।।/मोरी सीता के भीजे सेनुरवा/ लवटि घर आवहि हो राम।।’ यह लोकगीत हर उस मां की साध है जिसका पुत्र और उसका परिवार घर से दूर है और इन अर्थों में आज भी प्रासंगिक है। संतान के आगमन का शुभ समाचार सुनाने पर मां कहती है कि वह पुत्र आगमन की सूचना देने वाले कौवे की चोंच को सोने से मढ़ाएगी। ‘दूध-भात की दोनी खिवैहों/ सोने चोंच मढैयो कागा/ वेगि संदेस लावो।।’

अपनी संतान पर अपना सर्वस्व उत्सर्ग करने वाली मां का हृदय अपनी पुत्री के लिए भी उतना ही व्याकुल रहता है। अनेक प्रसंगों में बहुत चैतन्य चिंतातुर मां दिखती है। एक विवाह गीत में बेटी अपनी मां से स्वप्न में अपना विवाह होने की बात कहती है और मां उसे शिक्षा देती हैं- ‘नांहि सीखेऊ मइया रे छल चतुरइया/सीखेउं न राम रसोई।/सासु ननद बाबा भैया गरियावें, मोरे बूते सहियो न जाये।।/गुन सीखी लिहयु बेटी, ढंग सीखी लिहयू, सीखिउ राम रसोई/ सासु ननद भैया बाबा गरियावें, लै लिहयू आंचर पंसारि।।/अरे सहि लिहयु माथे नवाय।।’

लोकगीतों के भीतर मां के अंतर्मन के सुख-दुख का अद्भुत प्रवाह दिखता है। विभिन्न उदाहरणों से यह बात समझी जा सकती है। जैसे कि बेमेल विवाह सदा ही समाज का अभिशाप रहा है। यदि पिता चुपचाप बेमेल विवाह तय कर आया है तो मां छोटी उमर की अपनी लाड़ली के बेमेल विवाह का विरोध करती है। यह गीत देखें, इसमें मां का आक्रोश भी है और समाज के लिए सीख भी- ‘दसई बरस का मोर रंगरैली आसिया बरस का दामाद/निकरि न आवे तू मोरि रंगरेली अजगर ठाड़ दुआर।।’ अपनी बेटी के भविष्य को लेकर मां के मन में सदा आशंका रहती है। एक कोहबर गीत देखें, जिसमें मां और बेटी साथ बैठकर बाल झाड़ रही हैं, गौने का दिन आ गया है इसलिए बेटी रोने लगती है। गौना कराने रामचंद्र आते हैं तो कन्या की माता अपने दामाद से निवेदन करती है कि बड़ी तपस्या से बेटी पैदा हुई है, उसे कष्ट न होने पाए- ‘माई धिया बार झारैं नयनन आंसू ढरैं।।/घोड़वा चढ़ल राजा रामचंद्र से अरज करें/ बेटवा बड़ी रे तपस्या धिया जनमल ताड़न जिन दीन्हा।।’

एक गीत जो मुझे अत्यंत प्रिय है। खुसरो के कालजयी गीत में जब ब्याहता बेटी अपनी मां से मायके बुलाने की गुहार लगाती है तो लाचार मां ही उसे समझाती है, ‘अम्मा मेरे बाबा को भेजो री/कि सावन आया।।/बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री/कि सावन आया।।’स्त्री जब मां बनती है, तो उसकी भूमिका जीवन में पूर्णता लाने की ओर सचेष्ट हो जाती है और पूर्णता की राह परमार्थ में जीकर ही मिलती है। इसीलिए मां का दूसरा नाम त्याग है। सभी संबंधों को नित्य नए प्राण देती मां स्वयं में एक धरोहर बन जाती है! जब-जब हम इन लोकगीतों को स्वर देते हैं, दोहराते हैं, मां के गुरुपद को अर्चते हैं। हर संतान अपनी मां को धरोहर समझ उसका सम्मान करे, रक्षा करे, गर्व करे। संतान होने की सार्थकता अपनी मां के त्याग को अनुभूत करने में है, प्रेम करने मे है!

(लेखिका प्रख्यात लोकगायिका हैं)

Edited By: Sanjay Pokhriyal