पटना [प्रशांत कुमार]। 13 साल की किशोरी आज भी नींद में चीखती है। भरी-पूरी दुनिया में उसका कोई अपना नहीं है। किसी पराए से वह कोई वास्ता भी नहीं रखना चाहती है। खून के रिश्ते से भी उसे नफरत हो चुकी है। कारण, उसका दादा उसकी मां की सहमति से सात साल की उम्र से उसका यौन शोषण कर रहा था। पीडि़ता रामकृष्ण नगर निवासी 13 वर्षीय रागिनी (काल्पनिक नाम) कोर्ट के आदेश पर बालिका अल्पावास गृह में रह रही है। दादा ने उसके जिस्म पर जो जख्म दिए थे, वे लगभग भर चुके हैं। लेकिन, मां ने आरोपित का साथ देकर उसके दिलोदिमाग पर जो सितम ढाया, उसकी टीस अब भी ताजा है। मां और दादा के चंगुल से छूटे हुए रागिनी को चार महीने हो चुके हैं।

पिता की शक्ल याद नहीं

रागिनी को पिता की शक्ल तक याद नहीं है। उसकी एक छोटी बहन और दो छोटे भाई हैं। वह जब भी मां से पिता के बारे में पूछती तो जवाब मिलता- मर गया होगा कहीं। बहन और भाइयों को तो पता भी नहीं था कि उसके साथ क्या हो रहा है? मां से किसी तरह की उम्मीद नहीं थी, क्योंकि उसने खुद उसे दलदल में धकेला था।

प्रिंसिपल से मिला स्नेह तो मिली मुक्ति

दादा आर्मी से रिटायर्ड हैं। घर का खर्च वही चलाते थे, पर घर के सदस्यों को रिश्तेदारों से मिलने की इजाजत नहीं थी। दिखावे के लिए वे रागिनी को नामी स्कूल में पढ़ाते थे। स्कूल की प्रिंसिपल अक्सर महसूस करती थी कि रागिनी का व्यवहार दूसरी लड़कियों की तरह नहीं है। उन्हें मालूम था कि अगर वह सीधे सवाल करेंगी तो रागिनी सही जवाब नहीं देगी। उन्होंने इधर-उधर की बातें कर रागिनी को बहलाया और फिर मुद्दे पर आईं। रागिनी का दर्द छलककर आंसुओं के रूप में बह निकला। उसने कांपती आवाज में सारी बातें प्रिंसिपल से कह दीं। प्रिंसिपल दंग रह गईं और पुलिस को सूचना दी। प्रिंसिपल ने पुलिसकर्मियों से आग्रह किया कि वे वर्दी में नहीं आएं वरना रागिनी डर जाएगी।

नानी के पास रह रहे भाई-बहन

रागिनी की देखभाल एक एनजीओ कर रहा है। वह पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती है। उसे लगता है कि अगर उसके पिता सक्षम होते तो वह घर छोड़कर नहीं जाते और आज उसकी यह हालत नहीं होती। दोनों भाई और बहन नानी के साथ रह रहे हैं। मां और दादा जेल में हैं।

जब कोई करीबी यौन शोषण करता है तो पीडि़ता को सदमे से उबरने में काफी समय लगता है। अभिभावकों को बच्चों के बदलते व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए। शोषण की शिकार बच्ची को अभिभावक दूसरे शहर ले जाएं। उन्हें जो पसंद हो वही खिलाएं और उनके मन की बातें करें। अगर वह रोना चाहती है तो रोने दें, फिर गले लगाकर बातें करें। भरोसा दिलाएं कि अभी कुछ खत्म नहीं हुआ है। हादसे से जुड़ी बातें घर में न दोहराई जाएं।

आंकड़ों में भयावहता (बिहार)

- 36 फीसद : बाल यौन शोषण के मामलों में पांच साल में हुई वृद्धि

- 82 हजार : लड़कियां 20 साल में हुईं यौन शोषण का शिकार

- 86 फीसद लड़कियां करीबी लोगों के शोषण का हुईं शिकार

(स्रोत-एनसीआरबी की रिपोर्ट )

एक उम्र के बाद अकेले बुजुर्ग के साथ नहीं छोड़ें बच्चों को

बचपन बचाओ आंदोलन नामक संस्था की रिपोर्ट के अनुसार ज्यादातर लड़कियां परिवार के बुजुर्गों के शोषण का शिकार हुई हैं। इसलिए एक उम्र के बाद बच्चियों को घर में अकेले बुजुर्ग के पास नहीं छोडऩा चाहिए। बुजुर्गों में वर्षों की यौन कुंठा और शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव उनके असंतुलित व्यवहार के लिए जिम्मेदार होते हैं। प्रोस्टेट ग्रंथि के बढऩे के साथ यौन इच्छाओं में भी वृद्धि हो जाती है। बच्चियां आसानी से उनके चंगुल में आ जाती हैं।

Posted By: Ravi Ranjan

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