पटना [अरविंद शर्मा]। भारतीय जनता पार्टी (BJP) विरोधी दलों के लिए सियासी रूप से मुश्किल घड़ी में सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने कांग्रेस (Congress) की दोबारा कमान संभाल तो ली है, किंतु बिहार में महागठबंधन (Grand Alliance) के साथी दल ही उनका असली इम्तिहान लेंगे। प्रदेश कांग्रेस के नेता उम्मीद जरूर जता रहे हैं कि सोनिया की सदारत में विपक्ष के पस्त अरमानों को संजीवनी मिल सकती है, लेकिन राष्ट्रवादी भावना के उभार के दौर में कांग्रेसियों की हसरत कितनी पूरी होगी, यह वक्त बताएगा। फिलहाल सोनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती बिहार में अलग-अलग पगडंडियों पर चल रहे महागठबंधन के घटक दलों को दोबारा इकट्ठा करना है।

विपक्ष में समन्‍वय व संवाद का अभाव

राहुल गांधी (Rahul Gandhi) और तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) के नेतृत्व में बिहार में लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election) की शिकस्त ने पहले से ही विपक्ष की सियासत को अस्त-व्यस्त कर रखा है। तीन तलाक (Triple Talaq)  और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 (Article 370) हटाने के मुद्दों पर मिली मात ने उन्हें मुकाम के रास्ते से भी भटका दिया है। आपस में कोई समन्वय व संवाद नहीं है।

सतह पर आयी प्रदेश कांग्रेस की कलह

केंद्र सरकार के ऐतिहासिक फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर के शांत माहौल ने भी गठबंधन के नेताओं को बेचैन कर दिया है।  प्रदेश कांग्रेस में भी कलह खुलकर सामने आ रही है। कई नेता छोड़कर जाने के रास्ते पर हैं। पूर्व प्रदेश सचिव देवेंद्र प्रसाद सिंह ने पी. चिदंबरम और दिग्विजय सिंह के बयान को सांप्रदायिक और देश विरोधी करार दिया है। जाहिर है, माहौल विपरीत होते देख आपस में ही तलवारें खिंचने लगी हैं। सबको एक पटरी पर लाना सोनिया के लिए इतना आसान नहीं होगा।

बिखरे कुनबे को एक करना आसान नहीं

हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) प्रमुख जीतनराम मांझी (Jitan Ram Manjhi) गठबंधन के अस्तित्व को नकार रहे हैं। उनके बयानों में राजद-कांग्र्रेस से बढ़ रही दूरी साफ झलक रही है। तेजस्वी यादव ने मैदान छोड़ दिया है। उनकी गतिविधियों से लगता है कि राजनीति से उन्हें ज्यादा वास्ता नहीं रह गया है। पौने तीन महीने से पटना छूट चुका है। नई दिल्ली में नया बसेरा बना लिया है। राष्‍ट्रीय जनता दल (RJD) के कार्यक्रमों से भी खास मतलब नहीं रह गया है।

उम्‍मीद जगाता कौकब कादरी का बयान

ऐसे में कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष कौकब कादरी का बयान विपक्ष में उम्मीद जगाती है। बकौल कादरी, सोनिया के आने से निराशा का भाव खत्म हो जाएगा। विपक्ष को संजीवनी मिल जाएगी। लालू प्रसाद (Lalu Prasad Yadav) के साथ उनके अच्छे संबंध रहे हैं। सबको साथ लेकर चलना बेहतर जानती हैं।

लेकिन कादरी के बयान से आरजेडी के राष्ट्रीय प्रवक्ता नवल किशोर सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि सोनिया का असर बिहार में कांग्रेस पर पड़ सकता है, किंतु गठबंधन पर कुछ खास नहीं। घटक दल अपने स्तर से काम कर रहे हैं। ऐसे में राहुल के जाने और सोनिया के आने से असर का सवाल ही बेमतलब है।

राहुल के वक्त भी एक नहीं था विपक्ष

बिहार की विपक्षी सियासत को राहुल गांधी से भी ज्यादा संबल नहीं मिल सका था। कांग्रेस की कमान 19 महीने राहुल के पास रही है। लगभग इसी दौरान बिहार की सत्ता से राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को बेदखल करने के मकसद से लोकसभा चुनाव के पहले पांच दलों ने मोर्चा बनाया। बड़े-बड़े दावे किए। सियासी जोड़-तोड़ कर कुछ छोटे दलों को भी साथ लाए। मजबूत विकल्प के इरादे जताए। किंतु सपने सच नहीं हुए।

न तो महागठबंधन का साझा घोषणा पत्र बना, न समन्वय समिति बनी और न ही कोई संयुक्त बैठक हुई। प्रचार के दौरान भी दरार, तकरार और दूरियां सामने आने लगीं। यहां तक कि लोकसभा की नौ सीटें लेने में भी कांग्रेस के बड़े नेताओं के पसीने छूट गए। बीजेपी छोड़कर कांग्रेस की शरण में गए कीर्ति झा आजाद को दरभंगा से बेदखल होना पड़ा। सुपौल सीट के लिए अारजेडी मचल गया। कांग्रेस प्रत्याशी के खिलाफ आरजेडी के स्थानीय नेताओं ने बगावत कर दी।

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Posted By: Amit Alok

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