पटना। भारतीय शिक्षा और शोध परंपरा का गौरवशाली अतीत रहा है। नई शिक्षा नीति में आधुनिकता के साथ अपने गौरवशाली इतिहास को भी शामिल करने की जरूरत है। ये बातें राज्यपाल और कुलाधिपति लालजी टंडन ने पटना एम्स में आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला के दौरान कहीं। वे महात्मा गाधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी और भारतीय राजनीति विज्ञान परिषद् के संयुक्त तत्वावधान में नई शिक्षा नीति प्रारुप विषय पर आयोजित कार्यशाला में बोल रहे थे।

कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि राज्यपाल ने कहा कि आज तमाम विश्वविद्यालयों के कुलपति और विद्वान जिस विषय पर चिंतन करने के लिए यहा एकत्रित हुए हैं, आने वाले भारत के लिए यह एक बहुत महत्वपूर्ण कदम होगा। कबीरदास का जिक्र बड़े ही रोचक ढंग से करते हुए कहा कि इस देश में जो निरक्षर रहे, वे भी सबसे बड़े शिक्षक हुए। यह विचित्र लोगों का देश है, इसमें एक नया नाम है कबीर का, जिन्होंने अपने बारे में बताया कि मसि कागद छूयो नहीं, कलम गह्यो नहीं हाथ। आगे कहा कि कबीर का कहा गया वाक्य, पोथी पढि़-पढि़ जग मुआ, पंडित भया ना कोये, ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय, अपने आप में एक दर्शन है। युवकों में गौरवबोध जगाने की जरूरत

नई शिक्षा नीति पर चर्चा को दिशा देते हुए राज्यपाल ने कहा कि जब तक हमारे युवकों में अपने देश, अपनी परंपरा, अपने इतिहास के प्रति स्वाभिमान और गौरव नहीं पैदा होगा, तब तक यहा की शिक्षा सिर्फ किताब होगी। हमारे पास वो सब कुछ है, जिसका गौरव होना चाहिए। कैसे उसे उभार कर आज दुनिया के सामने लाएं, ये शिक्षाविदों का काम है। वे ऐसी शिक्षा नीति का निर्माण करें कि जिससे आने वाले कल में हममें से भी कुछ ऐसे लोग निकलें, जो चाणक्य बनें।

अणु और परमाणु वेदों की देन

राज्यपाल ने कहा कि अणु और परमाणु शब्द वेदों की देन हैं। दुनिया में सबसे पहले अणु शब्द और उसके विस्फोटक रूप का वर्णन वेदों में है। हजारों साल पहले यह ज्ञान हमारे पास था। दो-तीन सौ साल पहले दुनिया ने इसका अनेकों रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया और हम भूल गये। वहीं से हम चूक गये।

नैक के आयोजन से मिली प्रेरणा

अध्यक्षीय संबोधन में महात्मा गाधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) संजीव कुमार शर्मा ने कहा कि नई शिक्षा नीति बहुत बड़ी है। इस पर चर्चा करना एक बड़ा काम है। गत दिनों नैक ने करीब 20-22 कुलपतियों को आमंत्रित कर इस पर एक सम्मेलन किया था। इसी क्रम में बिहार के राज्यपाल लालजी टंडन से चर्चा हुई। इस चर्चा में ये विचार आया कि हम बिहार के विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को और बिहार में स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के साथ विचार-विमर्श करें। इस आयोजन को करने के विचार का सूत्रपात भी राज्यपाल द्वारा हुआ।

14 राज्यों के 28 कुलपति हुए शामिल

डॉ. संजीव ने एम्स के पूर्व निदेशक प्रो. जीके सिंह, पटना एम्स के वर्तमान निदेशक निदेशक प्रो. प्रभात कुमार सिंह के सहयोग का जिक्र करते हुए कहा कि दोनों ने आयोजन के लिए व्यवस्था सुनिश्चित की। 14 राज्यों के 28 कुलपति समेत विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए कुलपतियों, प्रतिकुलपतियों और शिक्षाविदों का आभार जताते हुए कहा कि बहुत कम समय के निवेदन पर सभी यहा उपस्थित हुए हैं। यहा डॉक्टर उपस्थित हैं। आइआइएमसी के पूर्व महानिदेशक केजी सुरेश जैसे तमाम विद्वान उपस्थित हैं, आप विचार मंथन करेंगे। उम्मीद है कि इस मंथन का एक सार्थक निष्कर्ष निकलेगा। जो उच्च शिक्षा की दिशा प्रवृत्त करने में न सिर्फ भारत सरकार के लिए सहायक सिद्ध होगा, बल्कि उच्च शिक्षा संस्थानों के नेतृत्व का भी पाथेय बनेगा।

31 जुलाई तक चलेगी कार्यशाला

इससे पूर्व केविवि के प्रति कुलपति प्रो. अनिल कुमार राय ने उपस्थित अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यशाला के विषय का संक्षिप्त परिचय दिया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति समिति के सदस्य प्रो. मजहर आसिफ ने बीज वक्तव्य दिया, जबकि केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो. के. जयाप्रसाद ने धन्यवाद ज्ञापित किया। विभिन्न विवि के कुलपतियों, प्रतिकुलपतियों और शिक्षाविदों ने की नई शिक्षा नीति प्रारुप पर अलग-अलग समूहों में चर्चा की। 31 जुलाई तक महात्मा गाधी केंद्रीय विश्वविद्यालय और भारतीय राजनीति विज्ञान परिषद् के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यशाला की रिपोर्ट मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भेजी जाएगी। भारतीय स्टेट बैंक, मोतिहारी इस कार्यशाला का प्रायोजक रहा। इस कार्यशाला में यूजीसी के सदस्य प्रो. जी. गोपाल रेड्डी समेत बड़ी संख्य़ा में शिक्षाविद उपस्थित रहे।

Posted By: Jagran

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