गयाजी में पिंडदान से पहले जानिए माता सीता के 5 श्राप, 1 पेड़ को दिया था वरदान
गयाजी में पितृपक्ष के लिए पिंडदान की परंपरा का विशेष महत्व है, जहां माता सीता ने राजा दशरथ का पिंडदान ...और पढ़ें

गयाजी में पिंंडदान और तर्पण का विशेष महत्व। AI जेनरेटेड फोटो
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माता सीता ने गया में राजा दशरथ का पिंडदान किया था।
फल्गु नदी, गाय, ब्राह्मण, कौआ, तुलसी को सीता ने श्राप दिया।
अक्षयवट को माता सीता से दीर्घायु और हरा-भरा रहने का वरदान।
डिजिटल डेस्क, गया। Gaya Pind Daan: पितृपक्ष 2026 के लिए गयाजी में पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध शुरू होने वाला है। देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पितरों की आत्मा की शांति-मोक्ष की कामना लेकर यहां पहुंचते हैं।
परंतु क्या आप जानते हैं कि गयाजी में माता सीता ने 5 श्राप और 1 वरदान दिया था? यहां पिंडदान की परंपरा इतनी खास क्यों मानी जाती है? इसके पीछे भगवान विष्णु और गयासुर की कथा का एक बेहद रोचक प्रसंग भी बताया जाता है।
गया में ही क्यों होता है पिंडदान?
फल्गु नदी के तट पर बसे गयाजी (बिहार सरकार ने 16 मई 2025 को गया शहर का नाम बदलकर गयाजी कर दिया है।) को सनातन परंपरा में पितृकर्म के लिए सबसे महत्वपूर्ण तीर्थों में माना जाता है।
इस संबंध में गयापाल तीर्थ पुरोहित महेश लाल गुप्त (पीतल किवाड़ वाले) बताते हैं कि धार्मिक मान्यता है कि यहां पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष मिलता है और सात पीढ़ियों का उद्धार होता है।
वह कहते हैं कि पौराणिक मान्यता के अनुसार, गया का संबंध गयासुर नामक दैत्य से है। गयासुर ने कठोर तपस्या कर भगवान विष्णु से वरदान प्राप्त किया था, जिससे उसका शरीर पवित्र हो गया।
इसके बाद उसके दर्शन मात्र से जीव को मुक्ति मिलने की बात कही जाने लगी थी। इससे देवताओं के लिए बड़ी समस्या खड़ी हो गई और स्वर्ग-नरक का संतुलन बिगड़ने लगा था।
देवताओं के आग्रह पर भगवान विष्णु गयासुर के पास पहुंचे। इसके बाद गयासुर की पीठ पर यज्ञ किया गया। गयासुर भगवान विष्णु से प्रभावित हुआ और उसने उनसे इसी स्थान पर हमेशा विराजमान रहने का वरदान मांगा।
मान्यता है कि भगवान विष्णु ने उसे वरदान दिया कि गया की इस पवित्र भूमि पर जो व्यक्ति अपने पितरों का पिंडदान और तर्पण करेगा, उसके पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होगी।
इसी कारण गया को पितृकर्म के लिए विशेष तीर्थ माना जाता है। यहां भगवान विष्णु के चरणचिह्न वाले विष्णुपद मंदिर का भी विशेष धार्मिक महत्व है।

राजा दशरथ के लिए माता सीता ने किया था पिंडदान
पुरोहित महेश लाल गुप्त आगे बताते हैं कि गया से जुड़ी पौराणिक कथा भगवान राम, माता सीता और राजा दशरथ की है।
मान्यता के अनुसार, वनवास के दौरान भगवान राम को जब पिता दशरथ के निधन का समाचार मिला तो वह पिंडदान के लिए गया पहुंचे।
राम और लक्ष्मण पिंडदान की सामग्री जुटाने के लिए गए। इसी दौरान पितरों के पिंडदान का समय निकलने लगा। कुतप काल (मुहूर्त) तेजी से निकल रहा था।
विष्णुपद प्रबंधकारणी समिति के अध्यक्ष शंभू लाल विट्ठल ने कहा कि, राजा दशरथ की आत्मा ने माता सीता से पिंडदान करने के लिए कहा।
माता सीता ने कहा कि पिंडदान का अधिकार तो पुत्र का होता है, वे कैसे यह कर सकती हैं। राजा दशरथ की आत्मा ने कहा, अब आप मेरे कुल में आ गई हैं, इसलिए आप पिंडदान करें और मुझे मोक्ष दें।
आकाशवाणी के बाद वहां एक हाथ प्रकट हुआ। ऐसे में माता सीता ने फल्गु नदी के किनारे उपलब्ध बालू से ही पिंड बनाकर राजा दशरथ का पिंडदान कर दिया।
कहा जाता है कि माता सीता ने अपने ससुर दशरथ का पिंडदान करने की घटना का साक्षी फल्गु नदी, गाय, ब्राह्मण, कौआ, तुलसी और अक्षयवट को बनाया था।

जब राम ने मांगा पिंडदान का प्रमाण
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान राम और लक्ष्मण जब वापस लौटे तो माता सीता ने उन्हें बताया कि वह राजा दशरथ का पिंडदान कर चुकी हैं।
राम को इस बात पर आश्चर्य हुआ। तब माता सीता ने उन साक्षियों से पुष्टि करने को कहा। मान्यता के अनुसार, अक्षयवट को छोड़कर बाकी साक्षियों ने माता सीता का साथ नहीं दिया।
इसके बाद माता सीता क्रोधित हो गईं और उन्होंने कथित रूप से उन साक्षियों को अलग-अलग श्राप दे दिए। कहा जाता है कि छह में से पांच साक्षियों को उन्होंने श्राप दिया।

माता सीता ने किसे क्या श्राप दिया?
- फल्गु नदी: मान्यता है कि माता सीता के श्राप के कारण फल्गु नदी का पानी अधिकांश समय ऊपरी सतह पर दिखाई नहीं देता। गया में आज भी फल्गु नदी के कई हिस्सों में रेत के नीचे पानी की धारा मिलने को इस कथा से जोड़ा जाता है।
- गाय: कथा के अनुसार, गाय को श्राप मिला कि पूजनीय होने के बावजूद उसे भोजन के लिए भटकना पड़ेगा। वह जूठन खाएगी।
- ब्राह्मण: मान्यता है कि उस समय वहां मौजूद ब्राह्मण को श्राप मिला कि उसे कितना भी दान मिले, उसके पास दरिद्रता बनी रहेगी और वह कभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं होगा।
- कौआ: कहा जाता है कि कौए को श्राप मिला कि वह अकेले भोजन करके कभी संतुष्ट नहीं होगा और उसकी मृत्यु भी अचानक होगी।
- तुलसी: पौराणिक मान्यता में माता सीता के श्राप के कारण ही तुलसी पवित्र होने के बावजूद जहां-तहां उगती रहती है।
अक्षयवट को मिला माता सीता का वरदान
कथा में एकमात्र अक्षयवट ऐसा साक्षी बताया गया है, जिसने माता सीता का साथ दिया। इससे प्रसन्न होकर माता सीता ने उसे दीर्घायु होने और हमेशा हराभरा रहने का वरदान दिया।
गयाजी स्थित अक्षयवट (विष्णुपद मंदिर के पास स्थित) आज भी पितृकर्म से जुड़ा प्रमुख धार्मिक स्थल माना जाता है। मान्यता है कि यहां किए गए पिंडदान और श्राद्ध कर्म का विशेष फल मिलता है।
गया को क्यों कहा जाता है मोक्ष की धरती?
गयापाल तीर्थ पुरोहित महेश लाल गुप्त (पीतल किवाड़ वाले) के अनुसार, यह स्थान त्रेता काल से ही पितृकर्म का प्रमुख तीर्थ रहा है।
यहां पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध की परंपरा का संबंध भगवान विष्णु और गयासुर की कथा से जोड़ा जाता है। सनातन काल में इस क्षेत्र का दायरा काफी ज्यादा था।
इसी धार्मिक विश्वास के कारण पितृपक्ष के दौरान गया में देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ विदेशों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं और फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर, अक्षयवट सहित विभिन्न वेदियों पर अपने पितरों के लिए पिंडदान और तर्पण करते हैं।
नोट: माता सीता के श्राप और गयासुर से जुड़ी ये बातें पौराणिक एवं धार्मिक मान्यताओं पर आधारित कथाएं हैं, ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटनाएं नहीं।
