औरंगाबाद [अनिल कुमार मिश्रा]। देश के लिए शहीद होकर शिवशंकर प्रसाद गुप्ता अमर हो गए हैं। कारगिल युद्ध के 20 साल बाद भी स्मृतियां ताजी हैं। उन्हीं स्मृतियों के साथ परिजनों के दिन गुजर रहे हैं। शहीद की विधवा रेखा देवी की मांग में भले ही सिंदूर नहीं, लेकिन उनके अनुसार पति की शहादत से उनका सुहाग दमक रहा है। अब वे अपने 19 वर्षीय पुत्र राहुल कुमार को देश सेवा के लिए सेना में भेजने की तैयारी में हैं। बेटा राहुल कुमार भी पिता की तरह सेना में जाकर दुश्‍मन के छक्‍के छुड़ाना चाहता है।

परिजनों  की आंखें नम पर सीना चौड़ा और सिर ऊंचा

कारगिल युद्ध में बिहार के 16 जवान शहीद हुए थे। उनमें औरंगाबाद के बगरा बंचर गांव निवासी शिवशंकर प्रसाद गुप्ता भी थे। वे बिहार रेजीमेंट की पहली बटालियन में सिपाही थे। बहाली के ढाई साल ही हुए थे कि सीमा से बुलावा आ गया। उनकी शहादत घर-परिवार को असह्य और अशेष दुख दे गई। आज भी उनकी यादें आंखें नम कर जाती हैं, लेकिन जिक्र छिड़ते ही परिजनों का सीना गर्व से चौड़ा और सिर ऊंचा हो जाता है।

पत्‍नी बोलीं: मांग में सिंदूर नहीं पर दमक रहा सुहाग

पिता नंदलाल प्रसाद गुप्ता और मां पूनम देवी का कहना है कि बेटे ने देश के लिए शहादत देकर हमारा सम्मान बढ़ाया है। रुंधे गले से विधवा रेखा देवी कहती हैं कि मैं अपने को सौभाग्यशाली समझती हूं। बेशक मांग में सिंदूर नहीं, लेकिन मेरा सुहाग दमक रहा है।

सेना में जा देश के दुश्‍मनों के छक्‍के छुड़ाना चाहता बेटा

पति की शहादत के वक्‍त पुत्री निशा एक वर्ष की थी और पुत्र राहुल गर्भ में था। निशा अभी मेडिकल की तैयारी कर रही हैं। 93 प्रतिशत अंकों के साथ राहुल इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर चुका है। आगे वह सेना में जाना चाहता है। पूनम देवी अब अपने बेटे को भी मैं सेना में भेजना चाहती हैं। 19 साल का बेटा राहुल कुमार भी सेना में जाने की तैयारी कर रहा है। उसके अनुसार वह पिता की तरह ही देश की सीमाओं की रक्षा करना चाहता है। वह देश के दुश्‍मनों के छक्‍के छुड़ाना चाहता है।

सीने पर गोली झेल की थी वतन की हिफाजत

सन् 1999 में कारगिल का युद्ध हुआ था। कंपनी कमांडर मेजर एम सरवानन और सेक्शन कमांडर नायक गणेश प्रसाद यादव शहीद हो चुके थे। उनके पार्थिव शरीर दुश्मनों के दायरे में थे। उन्हें वतन की मिट्टी देने की प्रतिज्ञा कर चुके शिवशंकर गुप्ता साथी सैनिकों के साथ चार जून की सुबह शव लाने के लिए आगे बढ़ चले।

दुश्मन लगातार गोलीबारी कर रहे थे, फिर भी शिवशंकर गुप्ता रेंगते हुए 14230 फीट ऊंची पथरीली व बर्फीली पहाड़ी पर पहुंच गए। वहां कंपनी कमांडर का पार्थिव शरीर पड़ा हुआ था। रेंगते हुए ही वे शव के पास पड़े हथियार और गोला-बारूद नीचे ले आए। दोबारा पार्थिव शरीर को लाने के लिए ऊपर चढ़ गए। शव को लेकर वे 50 मीटर की दूरी तय किए थे कि उसी बीच दुश्मन की गोली लगी। बिना घबराए उन्‍होंने मोर्चा संभाल लिया। अपने आग्नेयास्त्र से दुश्मन पर फायरिंग करते हुए उन्हें आगे बढऩे से रोक दिया। दो घंटे तक गोलीबारी होती रही। अंतत: सीने में एक गोली लगी और महज 20 साल आठ माह की उम्र में शिवशंकर गुप्ता शहीद हो गए।

पैतृक गांव के पास प्रतिमा स्थापित, श्रद्धा-सुमन की परंपरा

शहीद की स्मृति में पैतृक गांव के पास उनकी प्रतिमा स्थापित की गई है। जिला मुख्यालय में भी एक प्रतिमा है। औरंगाबाद में कारगिल शहीद समिति के अध्यक्ष पिंटू कुमार गुप्ता बताते हैं कि शिवशंकर गुप्ता की स्मृति में हर साल चार कार्यक्रमों का आयोजन होता है। इस साल भी समारोह आयोजित कर उन्हें याद किया गया। 26 जून को विजय दिवस पर शहीद को श्रद्धा-सुमन अर्पित किया गया।

गैस एजेंसी से सरक रही गृहस्थी की गाड़ी

शहीद की विधवा रेखा देवी को सरकार की ओर से जीवन-यापन के लिए गैस एजेंसी आवंटित की गई। उसी के सहारे आज गृहस्थी की गाड़ी सरक रही है। वे कहतीं हैं कि अब तो स्मृतियों के सहारे दिन गुजर रहे हैं। उन्‍हें पति की शहादत पर गर्व है। आगे उनकी इच्‍छा है कि बेटे को भी देश की रक्षा के लिए सेना में भेजें। 

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Posted By: Amit Alok

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