विजय शंकर दूबे, पटना। Emergency in India: वर्ष 1975 के शुरुआती माह से ही पटना में हर दिन कहीं-न-कहीं राज्य व केंद्र सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन सामान्य बात थी। इस दौरान जयप्रकाश नारायण (Jai Prakash Narayan During Emergency) पटना में ज्यादा समय दे रहे थे। हालांकि, जेपी 20 जून के आसपास दिल्ली चले गए थे। 25 जून को इमरजेंसी की घोषणा हो गई। इसके कुछ समय बाद ही पटना में भीषण बाढ़ आ गई। पाटलिपुत्र, शास्त्रीनगर, सचिवालय, हाईकोर्ट, कंकड़बाग आदि मोहल्ले डूब गए। पीने के पानी का सबसे ज्यादा संकट था। पीड़ि‍तों तक राहत सामग्री पहुंचाना प्रशासन के लिए चुनौती थी।

गुजरात में भी था जेपी का अच्‍छा संपर्क, पटना को मिला इसका फायदा 

जेपी की तबीयत काफी खराब चल रही थी। वे मुंबई में डायलिसिस पर थे। इस पीड़ा में भी उन्हें पटनावासियों की चिंता थी। उनके समर्थक और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य बड़ी संख्या में लोगों तक राहत पहुंचाने के लिए दिन-रात एक किए हुए थे। इससे प्रशासन को काफी मदद मिली। जेपी क्या थे? इसका अहसास बाढ़ राहत कार्य के दौरान हुआ। गुजरात में उनका काफी संपर्क था। इसका भी लाभ पटना को मिला। 

इंदिरा गांधी की घबराई आवाज सबकुछ बयान कर रही थी 

इमरजेंसी की घोषणा के समय धनरुआ प्रखंड के मधुबन स्कूल में कैंप कर रहा था। कई माध्यमों से होता हुआ इमरजेंसी का संदेश शाम में पीएस ने दिया। उस समय उपलब्ध वायरलेस की रेंज 10 किलोमीटर ही थी। संदेश के लिए कई माध्यमों का सहारा लेना पड़ता था। रेडियो पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का देश ने नाम संबोधन सुना। उनकी आवाज घबराई हुई थी।

पटना में कई द‍िनों तक रही कर्फ्यू जैसी स्‍थ‍ित‍ि 

जैसे लग रहा हो कि संकट में फंसे किसी व्यक्ति की आवाज हो, जबकि इंदिरा गांधी इसके विपरीत थीं। वे काफी स्पष्ट उच्चारण करती थीं। उन्होंने अपने संक्षिप्त संबोधन में लोगों को इमरजेंसी के बारे में बताया था। पटना में कई दिनों तक कर्फ्यू जैसी स्थिति थी। अफवाह फैली थी कि पुलिस किसी को पकड़कर गोली मार देगी। डर इतना था कि कार्यालय में सभी समय पर आते थे। ट्रेनें समय पर चलने लगीं। अखबारों पर सेंसरशिप प्रभावी था। 

पटना विश्वविद्यालय हुआ करता था मुख्य केंद्र  

इमरजेंसी के पहले प्रदर्शन का मुख्य केंद्र पटना विश्वविद्यालय हुआ करता था। यहां के शिक्षक और छात्र आंदोलन की रीढ़ थे। उस समय प्रो. डीएन शर्मा कुलपति हुआ करते थे। उनके आवास के पास छात्र नेताओं ने टेंट लगा दिया था। माइक से नारेबाजी करते थे। रात में उन्हें सोने में परेशानी होती थी। कार्यालय में ताला जड़ दिया गया था। कुलपति बगैर जानकारी दिए कार्यालय पहुंच गए। उस दौर में कुलपति का काफी सम्मान हुआ करता था। मेरे लिए उनका आना भगवान के पधारने जैसा था। अगले दिन ही उनके आवास के पास सुरक्षा की चाक-चौबंद व्यवस्था करा दी गई। 

(विजय शंकर दूबे आपातकाल लागू होते वक्‍त पटना के डीएम थे। उन्‍होंने तब के हालात के बारे में जागरण को बताया)

Edited By: Shubh Narayan Pathak