अशोक कुमार सिंह, बक्सर : पूड़ी-कचौड़ी के शौकीन लोगों को अक्सर अपने दिल का ख्याल रखते हुए मन को मारना पड़ता है। आने वाले समय में कोलेस्ट्राल रहित सरसों तेल किचन में होगा और मन मारने की जरूरत नहीं होगी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने पहली बार कैनोला गुणवत्तायुक्त सरसों के उन्नत बीज विकसित किए हैं। बक्सर के कृषि विज्ञान केंद्र में इस साल नई प्रजाति के ढाई क्विंटल बीज तैयार किए गए हैं, जो किसानों को दिए जा रहे हैं। नई प्रजाति के सरसों से तैयार तेल में हानिकारक तत्वों का अभाव रहेगा, साथ ही उपज की मात्रा भी बढ़ेगी। नई प्रजाति के बीज को पूसा-0031 नाम दिया गया है।

इस उन्नत बीज की खासियत है कि उसमें हानिकारक तत्व को नियंत्रित करते हुए काफी कम कर दिया गया है। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक सह कार्यक्रम प्रभारी हरिगोविंद जायसवाल ने बताया कि नई प्रजाति के बीज से उपज और प्रति किलो प्राप्त होने वाले तेल की मात्रा भी पहले की अपेक्षा ज्यादा होगी। उनका कहना है कि सरसों की अबतक प्रचलित प्रजाति में इरुसिक अम्ल की मात्रा 40 प्रतिशत तक तथा ग्लूकोसिनोलेट 120 पीपीएम तक होती थी। यह शरीर के लिए बेहद हानिकारक अम्ल है और कोलेस्ट्राल बढ़ाने का गुण होने के कारण विशेष रूप से उक्त रक्तचाप तथा हृदय रोगियों को हार्ट-अटैक के खतरे को बढ़ाता है। नई प्रजाति में इरुसिक अम्ल की मात्रा दो प्रतिशत से भी कम तथा ग्लूकोसिनोलेट की मात्रा 30 पीपीएम से भी कम होने के कारण ब्लड प्रेशर तथा हृदय रोगियों के लिए यह खतरा नहीं रहेगा।

कृषि केंद्र में ढाई क्विंटल बीज तैयार

कार्यक्रम प्रभारी ने बताया कि पूसा-0031 बीज से सरसों की खेती करने पर प्रति हेक्टेयर उत्पादन 23 क्विंटल तक होगा और इसकी पेराई में 41 प्रतिशत तक तेल प्राप्त होगा। यह पुरानी प्रजाति से मिलने वाले तेल से काफी ज्यादा है। पिछले साल प्रयोग के लिए मिले बीज से कृषि केंद्र में ढाई क्विंटल बीज तैयार किया गया है। इनमें से कुछ प्रदर्श के लिए संरक्षित कर लगभग 50 क्विंटल किसानों को प्रखंडवार प्रयोग के लिए मुफ्त दिया जाएगा। बाकी के बीज जो किसान ले जाना चाहेंगे, उन्हें शुल्क लेकर दिया जाएगा। शुल्क अभी तय नहीं है, लेकिन यह सौ रुपये से 120 रुपये प्रति किलो के बीच रहने की संभावना है। 

क्या है कैनोलायुक्त बीज की खासियत

कनाडा की विशेष फसल माना जाने वाला कैनोला उत्तर अमेरिका की अब नकदी फसल बन गया है। कृषि वैज्ञानिकों ने सरसों की इस प्रजाति को भारतीय जलवायु और वानिकी माहौल में तैयार होने के लायक विकसित किया है। इसमें सैचुरेटेड फैट कम और मोनोसैचुरेटेड फैट ज्यादा होते हैं। सैचुरेटेड फैट से ब्लड का कालेस्ट्राल लेवल बढ़ता है, वहीं मोनो और पॉलीसैचुरेटेड फैट दिल की बीमारी के खतरे को कम करते हैं। टाइप-2 के मधुमेह रोगियों के लिए भी यह फायदेमंद है, मोनोअनसैचुरेटेड फैट से ब्लड शुगर एवं इंसुलिन लेवल नियंत्रित रहता है। 

Edited By: Akshay Pandey