पटना, राज्य ब्यूरो। बिहार में शराबबंदी कानून को सफल बनाने की जिम्मेदारी पुलिस और उत्पाद विभाग पर है। सरकार का सख्त निर्देश है कि दूसरे राज्यों से आने वाले वाहनों की सीमा पर बनी समेकित जांच चौकियों के साथ शक होने पर रास्ते में चेकिंग की जाए। चेकपोस्ट और शहरी क्षेत्र में ऐसा हो रहा है, पर तस्कर गांव-देहात के रास्ते शराब और इसे बनाने में प्रयोग होने वाली स्प्रिट आदि लेकर दाखिल हो जा रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में कच्ची शराब बनाने वाले सक्रिय हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि गरीबों की बस्ती में कच्ची शराब का निर्माण और अवैध धंधा बदस्तूर पुलिस के संरक्षण में चल रहा है।

नालंदा में जिस पहाड़ी मोहल्ले में जहरीली शराब पीकर एक दर्जन से ज्यादा लोग काल कवलित हुए हैं। कई बीमार होकर भर्ती हैं और एक-दो लोग आंखों की रोशनी गंवा चुके हैं, वह अवैध बस्ती बताई जा रही है। जाहिर है वहां कच्ची शराब का निर्माण समेत दूसरे अवैध धंधे भी होते होंगे। खैर, इतना बड़ा कांड होने के बाद नालंदा पुलिस और प्रशासन ने ऐसी बस्तियों को खंगालना और हटाना शुरू कर दिया है। आधा दर्जन लोगों की गिरफ्तारी भी यहीं से हुई है। एसआइटी का गठन भी किया गया है जिसने काम शुरू कर दिया है। हालांकि इस कांड से यह सवाल उठना लाजिमी है कि राज्य में शराबबंदी को लागू हुए पांच साल से ज्यादा बीत चुके हैं, लेकिन रोजाना दूसरे राज्यों से आने वाले वाहन चोरी छिपे बड़ी मात्रा में अंग्रेजी और देसी शराब लेकर क्यों आ रहे और पकड़े जा रहे?

दरअसल शराब का अवैध धंधा उन लोगों के लिए बड़ा मुफीद साबित हो रहा जो पुलिस से गठजोड़ रखते हैं। ये बेरोजगारों को रोज पांच सौ-हजार की कमाई का लालच देकर उन्हें कैरियर बनाते हैं और पकड़े जाने पर जमानत कराने की गारंटी लेते हैं। नालंदा जैसे कांड की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सीमा और अवैध बस्तियों में सख्ती के साथ बिहार में शराबबंदी के बारे में दूसरे राज्यों में परिवहन सेवा में लगे लोगों के बीच जागरूकता अभियान चलाने की भी जरूरत है। हो सकता है वहां के ट्रक चालक बिहार में शराबबंदी लागू है, इससे अनभिज्ञ हों।

Edited By: Sanjay Pokhriyal