पटना [अमित आलोक]। बिहार में लोकसभा की एक तथा विधानसभा की दो सीटों पर रविवार को वोटिंग हो चुकी है। बीते साल जुलाई में राज्य के सत्ता समीकरण में बदलाव के बाद यह पहला चुनाव है। इसमें खासकर अररिया लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) व राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई है। कहने के लिए यहां राजद के सरफराज आलम व भाजपा के प्रदीप सिंह मैदान में हैं, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। यह चुनाव लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव का भविष्य भी तय करेगा।
इस सीट की अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी, लालू प्रसाद यादव के पुत्र व विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव, नीतीश कुमार के खिलाफ विद्रोह का झंडा थामे शरद यादव एवं महागठबंधन में लालू प्रसाद के नए सहयोगी व पूर्व मुख्यवमंत्री जीतनराम मांझी सहित दोनों तरफ के अनेक बड़े नेताओं ने प्रचार किया।
तस्लीमुद्दीन की मृत्यु के बाद रिक्त  सीट पर चुनाव
विदित हो कि अररिया लोकसभा सीट 'सीमांचल के गांधी' उपनाम से प्रसिद्ध रहे राजद के मो. तस्लीमुद्दीन की मृत्यु के बाद रिक्त हुई है। यहां उनके बेटे सरफराज आलम राजद से महागठबंधन के प्रत्याशी हैं। उनके खिलाफ भाजपा से राजग प्रत्याशी प्रदीप सिंह मैदान में हैं। राजद प्रत्याशी सरफराज जदयू में रहते ट्रेन में छेड़छाड़ के एक मामले में विवादों में आ गए थे। इसके बाद वे जदयू में हाशिए पर चल रहे थे। पिता की मौत के बाद उपचुनाव के पहले उन्होंने राजद का दामन थाम लिया।
बीते लोकसभा चुनाव (2014) के दौरान भाजपा की लहर में भी यहां राजद के मो. मस्लींमुद्दीन ने जीत दर्ज की थी। भाजपा इस उपचुनाव में उस हार की भरपाई करना चाहती है। उधर, राजद यहां जीत कर यह बताने की कोशिश में है कि लालू प्रसाद यादव के जेल में रहने के बावजूद पार्टी उनके बेटे तेजस्वी  यादव के नेतृत्व  में  मजबूत है।

हावी रहे विकास व मुस्लिम मुद्दे
अररिया में 40 फीसद से अधिक आबादी मुस्लिम है। फॉरबिसगंज में शिक्षक मो. अनवार आलम कहते हैं कि मुसलमानों के बड़े तबके ने राजद के पक्ष में वोट दिया। उनके अनुसार तस्लीमुद्दीन ने 'अच्छा  काम' किया है और लालू प्रसाद यादव भी मुसलमानों के हक की बात करते हैं। इसका फायदा सरफराज को मिला।
दूसरी ओर अररिया के ही एक मुस्लिम मतदाता मो. शमशाद कहते हैं कि चुनाव में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कहीं न कहीं फैक्टर रहे हैं। 2014 में नीतीश कुमार जब महागठबंधन में थे, महागठबंधन को वोट मिला था। मुसलमानों का एक वर्ग उनके विकास कार्यों का समर्थक रहा है। शमशाद के अनुसार इस चुनाव में भी मुसलमानों के एक वर्ग का वोट नीतीश के कारण भाजपा को मिला है। हालांकि, पटना विवि से स्नातक कर रहे अररिया के अफरोज जैसे युवा मुस्लिम मतदाताओं का एक वर्ग भाजपा के साथ अपना भविष्य  देख रहा है।

जिसके साथ रहे नीतीश, वो जीता
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के समर्थकों के अपने तर्क हैं। फॉरबिसगंज में शिक्षक सोनालाल यादव कहते हैं कि बीते तीन चुनावों में नीतीश कुमार जिस पार्टी के साथ रहे, वो जीती है। उनका इशारा 2004 व 2009 के लोकसभा चुनाव में अररिया से भाजपा की जीत तथा 2014 में हार की ओर था।
अररिया के शमशाद कहते हैं कि मुसलमानों में नीतीश कुमार की छवि 'विकास पुरुष' की है। कहते हैं कि मुसलमानों का एक वर्ग जाति-धर्म से परे विकास को लेकर सजग हो गया है। हालांकि, कुछ मुसलमासन मुसलमानों के मुद्दों को लेकर लालू को अधिक गंभीर मानते हैं। शमशाद कहते हैं कि चुनाव में इस बार नीतीश के कारण भी भाजपा प्रत्याशी के खाते में मुसलमानों के वोट गए हैं।

जदयू के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी यहां राजग की जीत को तय मानते हैं। वे कहते हैं कि अररिया में जब भी जदयू व भाजपा साथ रहे, राजग की विजय हुई है। इस बार भी ऐसा ही होगा।
तय होगा पप्पू  यादव व जीतनराम मांझी का भविष्य
अररिया लोकसभा सीट पर मतदान के बाद अब यह स्पष्ट है कि मुकाबला सरफराज आलम और भाजपा के प्रदीप सिंह के बीच ही है, हालांकि पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी ने राजद के वोट बैंक में सेंध जरूर लगाई है। इसका फायदा भाजपा को मिलेगा। ऐसे में अगर भाजपा की जीत होती है तो पप्पू यादव को इसका राजनीतिक फायदा मिल सकता है। 
ठीक उपचुनाव के पहले राजग छोड़कर महागठबंधन का दामन थामने वाले 'हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा' (हम) के सुप्रीमो व पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की दलित वोटरों पर पकड़ है। मांझी ने अररिया में जमकर चुनाव प्रचार किया है। अगर उपचुनाव में राजद के सरफराज की जीत होती है तो माना जाएगा कि मांझी दलित वोटों को राजद के पक्ष में शिफ्ट कराने में सफल रहे। इससे महागठबंधन में मांझी की ताकत बढ़गी।

तेजस्वी के सामने बड़ी चुनौती
राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के चारा घोटाला में जेल जाने के बाद पार्टी के भविष्य पर सवाल उठाए जाते रहे हैं। लालू के जेल जाने के बाद कुछ नेताओं ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में तेजस्वी के नेतृत्व पर सवाल खड़े किए थे। लेकिन, लालू ने तेजस्वी को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर सभी का मुंह बंद करा दिया।

इस बीच तेजस्वी  ने 'हम' को महागठबंधन में लाकर अपना कद बड़ा कर लिया। राजग के तमाम बड़े नेता अंत-अंत तक मांझी के महागठबंधन में जाने की बात को स्वी़कार करते नहीं दिखे। लेकिन, तेजस्वी  ने मांझी के घर जाकर मास्टर स्ट्रोक खेला और मांझी ने राजद से किनारा कर महागठबंधन में आने की घोषणा कर दी।
मांझी को महागठबंधन में लाकर तेजस्वी ने साबित किया कि वे पिता की छाया से दूर बड़े फैसले ले सकते हैं। अब अगर प्रतिष्ठा की सीट बने अररिया में सरफराज की जीत होती है तो तेजस्वी  के नेतृत्व पर मुहर लगनी तय है। लेकिन, इससे उलट स्थिति में राजद के बड़े नेताओं का विरोध मुखर हो सकता है।

अररिया लोकसभा क्षेत्र : एक नजर

- अररिया लोकसभा क्षेत्र में कुल मतदाता : 1738067
- पुरुष मतदाता- 919115, महिला मतदाता- 818286
- 18 से 19 आयुवर्ग के मतदाता: 12,994
- 20 से 29 आयुवर्ग के मतदाता: 4,30,963
- 30 से 39 आयुवर्ग के मतदाता: 4,61,313
- थर्ड जेंडर मतदाता: 67
- 13 बार हो चुके लोकसभा चुनाव, कभी कोई महिला प्रत्याशी नहीं जीती
- पिछले लोकसभा चुनाव में 61.48 फीसद वोट पड़े
- पिछले लोकसभा चुनाव में जदयू और भाजपा को मिले थे अधिक वोट
- इस उपचुनाव में 57 फीसद वोट पड़े
- इस बार उपचुनाव में सात उम्मीदवार

Posted By: Amit Alok