पटना [अरविंद शर्मा]। कर्नाटक की उठापटक ने बिहार की राजनीति को भी प्रभावित किया है। भाजपा विरोध के नाम पर भाकपा माले (सीपीआइ एमएल) पहली बार राजद के पाले में खड़ी नजर आ रही है। य‍ह वही माले है, जिसकी राजद के कद्दावर नेता व पूर्व सांसद मो. शहाबुद्दीन से अदावत जग-जाहिर रही है। लेकिन, कर्नाटक की तर्ज पर बिहार में राजग सरकार को अपदस्थ करने के लिए माले ने राजद को समर्थन पत्र सौंपकर नई चर्चा की शुरुआत कर दी है। संकेत साफ है कि माले की भूमिका बदल सकती है।

1985 से चुनावी प्रक्रिया में शामिल

माले को 80 के दशक में इंडियन पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के नाम से जाना जाता था। 1985 से यह चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने लगी। पहली बार 1989 के संसदीय चुनाव में कांग्रेस के बलिराम भगत एवं जनता दल के तुलसी सिंह जैसे नेताओं को आरा से हराकर आइपीएफ के रामेश्वर प्रसाद ने राजनीति को नया विकल्प देने की कोशिश की थी, लेकिन लालू प्रसाद की सियासी शैली के कारण आगे की राह मुश्किल होती गई। सिवान में राजद के बाहुबली नेता मो. शहाबुद्दीन से उसका संघर्ष भी जग-जाहिर है।

आगे का रास्‍ता लालू के साथ

अगले चुनाव में लालू की अगुवाई वाले जनता दल के टिकट पर रामलखन सिंह यादव ने रामेश्वर का रास्ता रोक दिया। तब से यह पार्टी छह-सात विधायकों की संख्या से आगे नहीं बढ़ सकी। हालांकि, पिछले वर्ष महागठबंधन लहर में तीन सीटों पर जीतकर इसने फिर उम्मीद जगाई है। अब आगे का रास्ता लालू के कंधे पर तय करने की तैयारी है। पार्टी के राज्य सचिव कुणाल के मुताबिक भाजपा को रोकने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकते हैं। जरूरत पड़ी तो राजद के साथ तालमेल भी कर सकते हैं।

शहाबुद्दीन को भी दी चुनौती

लालू-राबड़ी सरकार के दौरान वाम विचारों के बूते कद बढ़ाने वाली माले ने अबतक किसी के सामने समर्पण नहीं किया था। संघर्ष के सहारे राजद के बाहुबली नेता मो. शहाबुद्दीन को भी चुनौती देती रही। सामंती दमन के विरुद्ध संघर्ष किया। सामयिक सवालों पर सड़क से सदन तक एकाकी आंदोलन करने वाली माले ने राजद की राजनीति को पहली बार ऐसी स्वीकृति दी है। समय बताएगा कि अन्य वामदलों की तरह यह भी हाशिये पर चली जाएगी या लालू के कंधे के सहारे मंजिल पर दस्तक देगी।

Posted By: Amit Alok

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