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बिहार में PhD के नए नियम: 7.5 CGPA है तो 4 साल के ग्रेजुएशन के बाद सीधे एडमिशन, मास्टर डिग्री जरूरी नहीं

Published: Tue, 07 Jul 2026 08:33 PM (GMT+05:30)

बिहार में पीएचडी प्रवेश के लिए नए नियम 2026 लागू किए गए हैं, जिसके तहत शोध सहित स्नातक (प्रतिष्ठा) उत्तीर्ण छात्र सीधे पीएचडी में प्रवेश ले सकेंगे।

7.5 CGPA है तो 4 साल के ग्रेजुएशन के बाद सीधे PhD में एडमिशन (AI Generated Image)

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राज्य ब्यूरो, पटना। शोध सहित स्नातक (प्रतिष्ठा) उत्तीर्ण छात्र पीएचडी में प्रवेश ले सकेंगे। जिस छात्र को छह सेमेस्टर में 7.5 सीजीपीए या उससे ज्यादा मिलता है उन्हें स्नातक (प्रतिष्ठा) के साथ शोध करने का विकल्प मिलेगा, जबकि 7.5 सीजीपीए से कम लाने वाले छात्रों को स्नातक (प्रतिष्ठा) की डिग्री मिलेगी।

इतना ही नहीं, ऐसे छात्र जो शोध सहित स्नातक (प्रतिष्ठा) की डिग्री प्राप्त किए हैं वो चाहें तो बिना स्नातकोत्तर में प्रवेश लिए सीधे पीएचडी में प्रवेश ले सकेंगे, क्योंकि वो स्नातक (प्रतिष्ठा) चतुर्थ वर्ष में ही पीएचडी का कोर्स वर्क पूरा कर लेंगे।

यानी, ऐसे छात्र-छात्रा एक वर्षीय मास्टर डिग्री के बिना भी सीधे पीएचडी में प्रवेश के पात्र होंगे। इसका प्रविधान राज्यपाल एवं कुलाधिपति सचिवालय ने स्वीकृत बिहार स्टेट यूनिवर्सिटीज पीएचडी ऑर्डिनेंस एंड रेगुलेशंस, 2026 में किया गया है।

इसके साथ ही वर्ष 2017 के पुराने पीएचडी नियम समाप्त हो गए हैं। राज्यपाल की सहमति मिलने के बाद उनके अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार सिंह के हस्ताक्षर से ऑर्डिनेंस एंड रेगुलेशंस को जारी किया गया है। इसके तहत राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में पीएचडी की पढ़ाई अब नए नियमों के तहत होगी।

नए नियमों के मुताबिक तीन वर्षीय स्नातक करने वालों को दो वर्षीय स्नातकोत्तर या चार वर्षीय शोध सहित स्नातक (प्रतिष्ठा) के बाद एक वर्षीय मास्टर डिग्री पूरी करनी होगी। सामान्य वर्ग के लिए न्यूनतम 55 प्रतिशत अंक तथा आरक्षित वर्गों को यूजीसी नियमों के अनुसार छूट मिलेगी।

नई पीएचडी विनियमावली को यूनिवर्सिटी सर्विस कमीशन (यूजीसी) के 2022 के मानकों के अनुरूप तैयार किया गया है। इसे चार जुलाई 2026 की तिथि से ही प्रभावी बनाया गया है। इसी के साथ अब सभी विश्वविद्यालयों को अपने वैधानिक निकायों से इसे अपनाना होगा।

नई व्यवस्था के तहत पीएचडी में प्रवेश केवल यूजीसी-नेट, यूजीसी-सीएसआईआर-नेट या गेट उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को ही मिलेगा। प्रवेश के लिए 80 प्रतिशत वेटेज नेट-गेट अंक और 20 प्रतिशत वेटेज साक्षात्कार को दिया जाएगा।

पीएचडी की अवधि होगी तीन से छह वर्ष

शोध कार्य में रुचि रखने वाले शोधार्थियों के लिए अब पीएचडी की न्यूनतम अवधि तीन वर्ष और अधिकतम छह वर्ष होगी। विशेष परिस्थितियों में दो वर्ष का अतिरिक्त अवधि विस्तार दिया जा सकेगा। महिला शोधार्थियों और 40 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगता वाले शोधार्थियों को अतिरिक्त दो वर्ष की छूट मिलेगी।

नए नियमों के तहत सभी पीएचडी शोधार्थियों को शिक्षण, लेखन और शैक्षणिक प्रशिक्षण लेना होगा। उन्हें विश्वविद्यालयों में प्रति सप्ताह चार से छह घंटे तक ट्यूटोरियल, प्रयोगशाला कार्य या शोध सहायक के रूप में योगदान देना होगा।

पीएचडी उपाधि प्राप्त करने के लिए शोधार्थी को थीसिस जमा करने से पहले कम-से-कम एक रिसर्च पेपर प्रकाशित करना तथा एक राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सम्मेलन में शोधपत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा। थीसिस का प्लेजरिज्म 10 प्रतिशत से अधिक होने पर उसे संशोधन के लिए लौटाया जाएगा।

तीन वर्ष सेवानिवृत्ति में शेष तो प्राध्यापक को नहीं मिलेंगे नए शोधार्थी

नइ व्यवस्था में यह भी प्रविधान किया गया है कि जिन प्राध्यापकों की सेवानिवृत्ति में तीन वर्ष से कम समय बचा होगा, वे नए पीएचडी शोधार्थी नहीं ले सकेंगे। हालांकि वे पहले से पंजीकृत शोधार्थियों का मार्गदर्शन सेवानिवृत्ति तक जारी रख सकेंगे।

नियमों के अनुसार पीएचडी थीसिस का मूल्यांकन दो बाह्य परीक्षकों और शोध-निर्देशक द्वारा किया जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर वाइवा आनलाइन माध्यम से भी किया जा सकेगा। पूरी मूल्यांकन प्रक्रिया छह माह के भीतर पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है।