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आरक्षण छोड़ने को तैयार मंत्री संतोष सुमन, शिवेश भी बेटी को नहीं दिलाएंगे र‍िजर्वेशन; आनंद मोहन ने छेड़ी नई बहस

Published: Sun, 13 Sep 2026 08:31 AM (IST)

आनंद मोहन के बयान से बिहार में आरक्षण पर नई बहस छिड़ गई है, जिसमें उन्होंने पिछड़े वर्ग में 'सामंतों' ...और पढ़ें

आनंद मोहन और मंत्री संतोष सुमन। फाइल

आनंद मोहन और मंत्री संतोष सुमन। फाइल

राज्य ब्यूरो, पटना। आरक्षण को लेकर बिहार की राजनीति में बहस जारी है। पूर्व सांसद आनंद मोहन के बयान कि पिछड़े वर्ग में भी सामंत हैं, ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है।

पूर्व सांसद ने आरक्षण की समीक्षा की भी आवाज बुलंद की है। साथ ही उन्होंने जोड़ा है कि वह आरक्षण के विरोधी नहीं हैं, लेकिन अब इसकी समीक्षा का समय आ गया है।

पूर्व सांसद ने यह भी कहा क‍ि पिछड़ों में वर्षों से आरक्षण का लाभ लेने वाले अब सामंत हो गए हैं। ऐसे लोगों को स्वयं आरक्षण छोड़ना चाहिए।

जरूरत पड़ी तो छोड़ देंगे आरक्षण 

उधर, नरकटियागंज के एक कार्यक्रम में हम (से.) पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं बिहार सरकार मंत्री संतोष कुमार सुमन ने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी तो वे आरक्षण छोड़ने को भी तैयार हैं।

लेकिन समाज के कमजोर तबके के अधिकार और सम्मान से समझौता नहीं होना चाहिए। हालांकि सुमन का सीधे-सीधे निशाना लोजपा (रा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान पर है।

जबकि आनंद मोहन के बयान को पिछड़ा वर्ग के भीतर सामाजिक और आर्थिक असमानता की ओर इशारा करने वाला माना जा रहा है।

उनका तर्क है कि केवल जाति के आधार पर पिछड़ेपन को देखने के बजाय यह भी देखना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति की सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्या है।

पिछड़े वर्ग में भी ऐसे परिवार हैं जिनके पास लंबे समय से राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव है। ऐसे में आरक्षण का लाभ वास्तविक रूप से वंचित लोगों तक पहुंचाने की बहस फिर सामने आ गई है।

दूसरी ओर, दलित नेताओं का कहना है कि आरक्षण केवल आर्थिक सहायता का माध्यम नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक वंचना की भरपाई और प्रतिनिधित्व का संवैधानिक साधन है।

इसलिए संपन्नता के आधार पर आरक्षण की जरूरत खत्म होने का तर्क दलित-पिछड़े वर्गों की वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शाता।

भाजपा सांसद ने कह दी बड़ी बात 

उन्होंने संकेत दिया कि व्यक्तिगत स्तर पर आरक्षण का लाभ छोड़ना अलग विषय है, लेकिन पूरे समुदाय के अधिकार को समाप्त करने की मांग अलग मुद्दा है।

उनका कहना है कि समाज में समान अवसर की स्थिति बनने तक वंचित वर्गों को मिले संवैधानिक अधिकारों की रक्षा जरूरी है।

हम प्रमुख के बयान पर भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवेश कुमार का तर्क है कि मैं भी समाज के सबल लोगों से आग्रह करूंगा वह स्वयं आरक्षण का त्याग करें।

मैं अपनी बेटी के लिए देश में मात्र दो प्रतिशत सरकारी नौकरी के लिए आरक्षण का लाभ नहीं लूंगा। मेरी बेटी 51 प्रतिशत सामान्य कोटे में जगह बनाएगी। अनुसूचित जाति के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण है। मैं भी इस बात पक्षधर हूं कि जरूरत मंदों को आरक्षण लाभ मिलना चाहिए।