अरविंद शर्मा, पटना : लालू प्रसाद की राजनीति और मुस्लिम-यादव (माय समीकरण) के लिहाज से सीमांचल के जिले काफी उर्वर रहे हैं। यहां तीन दशकों से राजद की फसलें खूब लहलहाती रही हैं मगर पिछले दो चुनावों से राजद की इस उर्वर जमीन पर जदयू और भाजपा ने कब्जा जमा लिया था। 2020 के विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की भी एंट्री हो गई थी। इसे लेकर माय समीकरण के प्रबल पक्षधर लालू और एटूजेड के प्रवर्तक तेजस्वी यादव में बेचैनी थी। दोनों उसे राजद के लिए फिर से उपजाऊ बनाने के प्रयास में थे। खाद-पानी ओवैसी की पार्टी एआइएमआइएम से लेना था। सबकुछ तय था पर जल्दी इसलिए नहीं थी कि ओवैसी के सभी पांचों विधायक सत्तापक्ष के साथ नहीं थे। अहम मौकों पर वे तेजस्वी के साथ ही खड़े नजर आते थे। इसी बीच हिना शहाब की नाराजगी ने रंग लाया। घटनाक्रम तेजी से आगे बढ़ने लगा।

हिना राजद के दिवंगत बाहुबली नेता मो. शहाबुद्दीन की पत्नी हैं। वह राज्यसभा जाना चाहती थीं। लालू ने मौका नहीं दिया। लिहाजा खफा हिना ने 10 जुलाई के बाद काफिले के साथ प्रदेश की यात्रा पर निकलने का एलान करके राजद की परेशानी बढ़ा दी। स्पष्ट है हिना के फोकस में सबसे ज्यादा सीमांचल ही होता, जहां मुस्लिमों की आबादी 50 प्रतिशत से ज्यादा है। इस बिरादरी के दिल में बाहुबली शहाबुद्दीन के प्रति लगाव और परिवार के प्रति हमदर्दी है। हिना की यात्रा से इसकी मात्रा बढ़ सकती थी। ऐसे में इंतजार करना लालू को भारी पड़ सकता था। वह किसी हाल में सीमांचल में अपनी पुरानी स्थिति को प्राप्त करना चाहते थे। देर होने पर हिना शहाब के साथ ओवैसी के विधायकों का नया समीकरण बनने का खतरा था। 

राजद छोड़ने का हिना दे चुकी हैं संकेत

राजद में अनदेखी और उपेक्षा से खफा हिना शहाब ने पिछले हफ्ते ही यह कहकर राजद के वोट बैंक पर खतरे का संकेत दिया था कि वह अब किसी दल में नहीं हैं। मतलब यह कि राजद से उनका रिश्ता खत्म हो गया है। ऐसे में बकरीद के बाद काफिले के साथ प्रदेश भर में घूमने का सीधा असर लालू परिवार पर पड़ता। साथ ही सीमांचल में हिना के प्रति हमदर्दी से नया उबाल भी आ सकता था। पिछले चुनाव में ओवैसी के पांचों विधायक इसी क्षेत्र से जीतकर आए थे। 

ओवैसी के उत्साह पर लालू का ब्रेक

हैदराबाद से बाहर ओवैसी को बिहार में ही बड़ी सफलता मिली थी। पांच विधायक जीते थे। उत्साहित ओवैसी ने पूरे देश में अपनी पार्टी के विस्तार का सपना देखना शुरू कर दिया था। बिहार के बाद बंगाल भी इसी मकसद से गए थे, मगर वहां भी सफलता नहीं मिली। यूपी में भी भाग्य आजमाया। वहां भी निराशा हाथ लगी। एआइएमआइएम को तोड़कर राजद ने साफ संकेत दिया है कि वह अपने वोट बैंक को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। लालू से मिले झटके के बाद ओवैसी फिर से बैरक में लौटने पर मजबूर हो सकते हैं। 

Edited By: Akshay Pandey