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Bihar News: न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा बढ़ाने की मांग, सीजेएम से नीचे के अफसरों को भी मिले बाडीगार्ड

Published: Wed, 07 Oct 2026 08:33 AM (IST)

बिहार न्यायिक सेवा संघ ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) से नीचे के सभी न्यायिक अधिकारियों के लिए निजी सुरक्षा अधिकारी (पीएसओ) या बॉडीगार्ड की मांग की है।

एसीजेएम और मजिस्ट्रेट को भी रहता है जोखिम

एसीजेएम और मजिस्ट्रेट को भी रहता है जोखिम

राज्य ब्यूरो, पटना। बिहार न्यायिक सेवा संघ ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) से नीचे के सभी सेवारत न्यायिक अधिकारियों को कम से कम एक निजी सुरक्षा अधिकारी (पीएसओ) या बाडीगार्ड उपलब्ध कराने की मांग की है। संघ ने इस संबंध में गृह विभाग को पत्र भेजकर जल्द निर्णय लेने का आग्रह किया है।

संगठित अपराध के मामलों की करते हैं सुनवाई

संघ के सचिव अजीत कुमार सिंह ने पत्र में कहा है कि कनिष्ठ न्यायिक अधिकारी भी संगठित अपराध, उग्रवादी गतिविधियों और गंभीर आपराधिक मामलों की सुनवाई करते हैं।

इस दौरान उन्हें आरोपितों, विचाराधीन कैदियों और अन्य पक्षकारों से सीधे निपटना पड़ता है। ऐसे में उनकी सुरक्षा केवल पद के आधार पर तय करना उचित नहीं है।

एसीजेएम और मजिस्ट्रेट को भी रहता है जोखिम

संघ के अनुसार, अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) और प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट भी कई मामलों में सीजेएम के समान संज्ञान लेने की शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए इन अधिकारियों को भी सुरक्षा संबंधी जोखिम बना रहता है।

2017 में वापस ली गई थी सुरक्षा

संघ ने कहा कि मई 2017 में कनिष्ठ न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा वापस ले ली गई थी। करीब नौ साल बाद भी इस संबंध में कोई अंतिम नीतिगत फैसला नहीं हो सका है। संघ ने पुलिस मुख्यालय और सुरक्षा विभाग के निर्देशों का भी हवाला दिया है।

अदालत परिसरों में हो चुकी हैं गंभीर घटनाएं

निर्देशों में सुरक्षाकर्मियों को बिना जोखिम का आकलन किए हटाने से बचने को कहा गया था। पत्र में आरा, छपरा और सासाराम की अदालतों में बम विस्फोट तथा बेतिया में सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी के बावजूद विचाराधीन कैदी की हत्या जैसी घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है।

समान संस्थागत सुरक्षा नीति की मांग

बिहार न्यायिक सेवा संघ ने न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए एक समान संस्थागत नीति लागू करने की मांग की है। संघ का कहना है कि सुरक्षा व्यवस्था पद के बजाय न्यायिक दायित्व और वास्तविक जोखिम के आकलन के आधार पर तय की जानी चाहिए।