चोरी करने के बाद मोबाइल का क्या करते हैं चोर? बिहार में साइबर फ्रॉड के आंकड़ों से चौंकाने वाला खुलासा
बिहार में मोबाइल चोरी अब सिर्फ फोन गंवाने तक सीमित नहीं, बल्कि यह एक बड़े साइबर अपराध नेटवर्क का हिस्सा बन गई है।

सांकेतिक फोटो
HighLights
मोबाइल चोरी अब बड़े साइबर अपराध नेटवर्क का हिस्सा।
पांच वर्षों में 380 करोड़ रुपये की साइबर ठगी।
चोरी हुए 60% फोन साइबर फ्रॉड में इस्तेमाल।
जागरण संवाददाता, पटना। बिहार में मोबाइल चोरी अब सिर्फ कीमती फोन गंवाने तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह साइबर अपराध के एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा बनती जा रही है।
भीड़भाड़ वाले बाजारों, बस स्टैंडों और ट्रेनों से चोरी होने वाले मोबाइल फोन का इस्तेमाल बैंक खातों, यूपीआइ और डिजिटल वॉलेट तक पहुंच बनाने के लिए किया जा रहा है।
पुलिस, साइबर सेल और साइबर थाना के रिकार्ड के मुताबिक, चोरी हुए मोबाइल के जरिये बैंक खातों से पैसे निकालने की अनुमानित राशि वर्ष 2021 में 10 करोड़ रुपये थी, जो 2025 में बढ़कर 147 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पांच वर्षों में इस तरह की ठगी से करीब 380 करोड़ रुपये की चपत लगा है।आंकड़े बताते हैं कि मोबाइल चोरी और साइबर ठगी का यह गठजोड़ लगातार मजबूत हुआ है।
वर्ष 2021 में जहां इस तरह के फ्राड से 10 करोड़ रुपये की निकासी हुई, वहीं 2022 में यह राशि 13 करोड़, 2023 में 87 करोड़ और 2024 में 123 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। वर्ष 2025 में यह आंकड़ा 147 करोड़ रुपये बताया गया है।
यानी पांच वर्षों में निकासी की राशि में करीब 14.7 गुना वृद्धि हुई है। इनमें थानों में दर्ज मोबाइल स्नैचिंग के बाद रुपये निकासी की घटना भी शामिल है। इसके अलावा चोरी हुए मोबाइल का आगे क्या होता है, इस संबंध में दिए गए आंकड़े भी गंभीर तस्वीर पेश करते हैं।
इनके अनुसार, 60 प्रतिशत चोरी हुए मोबाइल का इस्तेमाल साइबर फ्राड में किया जाता है। 22 प्रतिशत फोन को पुर्जों में तोड़कर बेचने, 10 प्रतिशत को दोबारा बाजार में बेचा जाता है।
पटना में एक साल में 29 करोड़ रुपये की चपत
पटना में भी चोरी हुए मोबाइल के जरिये साइबर ठगी से होने वाली निकासी में लगातार वृद्धि हुआ है। वर्ष 2023 में जहां 21 करोड़ रुपये की निकासी बताई गई।
वहीं 2024 में यह राशि बढ़कर 23 करोड़ और 2025 में 29 करोड़ रुपये हो गई। यानी तीन वर्षों में पटना में इस तरह की निकासी करीब 38 प्रतिशत बढ़ी है।
बिहार में मोबाइल चोरी की घटनाओं में भी लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वर्ष 2021 में राज्य में मोबाइल चोरी के 28,400 मामले बताए गए थे।
2022 में यह संख्या बढ़कर 33,900, 2023 में 38,200 और 2024 में 46,700 हो गई। वर्ष 2025 में मोबाइल चोरी के 52,500 मामले दर्ज होने का आंकड़ा दिया गया है।
पांच वर्षों में मोबाइल चोरी के मामलों में करीब 85 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वर्ष 2024 के मुकाबले 2025 में 5,800 अधिक मामले सामने आए।
प्रति मोबाइल फ्राड की औसत राशि 30 हजार रुपये तक पहुंची
चोरी हुए मोबाइल से होने वाले साइबर फ्राड में प्रति फोन औसत नुकसान बढ़ने का भी अनुमान है। वर्ष 2023 में प्रति मोबाइल औसत फ्राड राशि 23,300 रुपये बताई गई थी। 2024 में यह बढ़कर 26,500 रुपये और 2025 में 30,000 रुपये हो गई।
तीन वर्षों में औसत राशि में करीब 29 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उपलब्ध आंकड़ों में चोरी हुए मोबाइल के साइबर अपराधों में इस्तेमाल के विभिन्न तरीकों का भी ब्योरा दिया गया है। इनमें यूपीआइ और बैंकिंग फ्राड की हिस्सेदारी सबसे अधिक 35 प्रतिशत बताई गई है।
सोशल मीडिया हैकिंग 22 प्रतिशत, लोन एप के जरिये ठगी 18 प्रतिशत और फर्जी केवाईसी से जुड़े अपराध 15 प्रतिशत बताए गए हैं। इसके अलावा आंकड़ों में एक और गंभीर पहलू सामने आता है।
चोरी हुए एक मोबाइल का इस्तेमाल केवल एक व्यक्ति को ठगने के लिए नहीं, बल्कि कई अलग-अलग फ्राड में किए जाने की बात कही गई है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 34 प्रतिशत मामलों में एक मोबाइल का इस्तेमाल एक से पांच फ्राड में हुआ। 41 प्रतिशत में छह से 20, जबकि 17 प्रतिशत में 21 से 50 फ्राड किए गए। आठ प्रतिशत मामलों में एक मोबाइल से 50 से अधिक फ्राड हुआ है।
सस्ते में बिकते हैं चोरी के मोबाइल, साइबर ठगी तक पहुंचता है नेटवर्क
मोबाइल चोरी से लेकर आनलाइन फ्राड तक का यह नेटवर्क कई स्तरों पर काम करता है। पहले चरण में चोर भीड़भाड़ वाले बाजारों, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और ट्रेनों में मोबाइल उड़ाते हैं।
इसके बाद दूसरे चरण में फोन स्थानीय खरीदारों को 500 से 1500 रुपये तक में बेच दिए जाते हैं। तीसरे चरण में तकनीकी जानकार सॉफ्टवेयर के जरिए फोन का लाक तोड़ने और आइएमईआइ नंबर से छेड़छाड़ करने की कोशिश करते हैं।
चौथे चरण में मोबाइल और उसमें मौजूद डेटा को अलग-अलग माध्यमों से आगे भेजा जाता है। आखिर में ऐसे फोन फर्जी काल सेंटरों और साइबर अपराधियों तक पहुंच सकते हैं।
ट्रैकिंग में क्यों आ रही बाधा
आइएमईआइ नंबर से छेड़छाड़ होने पर फोन की पहचान करना मुश्किल हो जाता है।
चोरी के मोबाइल लंबे समय तक बंद रखे जाते हैं।
साइबर सेल के पास जांच के लिए संसाधन सीमित हैं।
दूसरे राज्यों और देशों तक फैले नेटवर्क से कार्रवाई जटिल हो जाती है।
रोकथाम के लिए क्या जरूरी?
- मोबाइल चोरी और साइबर ठगी के मामलों की जांच के लिए संयुक्त टीम बनाई जाए।
- आइएमईआइ नंबर में अवैध बदलाव करने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई हो।
- सीमावर्ती जिलों में निगरानी बढ़ाकर विशेष टास्क फोर्स गठित की जाए।
- आम लोगों को मोबाइल सुरक्षा, शिकायत प्रक्रिया और साइबर अपराध से बचाव के प्रति जागरूक किया जाए।
वर्ष 2024 में मोबाइल चोरी के सर्वाधिक मामले वाले 10 जिले
| जिला | मामले |
|---|---|
| पटना | 7,450 |
| गया | 3,980 |
| मुजफ्फरपुर | 3,620 |
| भागलपुर | 3,210 |
| पूर्णिया | 2,980 |
| दरभंगा | 2,540 |
| बेगूसराय | 2,230 |
| नालंदा | 2,050 |
| आरा | 1,980 |
| मोतिहारी | 1,860 |
रिकवरी दर (बिहार)
| वर्ष | रिकवरी दर |
|---|---|
| 2023 | 11 प्रतिशत |
| 2024 | 10.9 प्रतिशत |
| 2025 | 10.6 प्रतिशत |
