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सवर्णों के 10% आरक्षण का जिक्र कर बिहार सरकार के मंत्री संतोष सुमन ने साधा निशाना, गिनाई जीतन राम मांझी की पहल

Published: Fri, 04 Sep 2026 02:40 PM (IST)

संतोष सुमन ने जीतन राम मांझी की 2015 में आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10% आरक्षण देने की पहल ...और पढ़ें

जीतन राम मांझी के साथ संतोष सुमन। फाइल

जीतन राम मांझी के साथ संतोष सुमन। फाइल

HighLights

  1. मांझी ने 2015 में आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10% आरक्षण प्रस्तावित किया।

  2. संतोष सुमन ने गरीबों के लिए HAM की समावेशी राजनीति पर जोर दिया।

  3. आरक्षण लाभों की समीक्षा पर शांतिपूर्ण चर्चा का समर्थन किया।

राज्य ब्यूरो, पटना। हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के अध्यक्ष एवं लघु जल संसाधन मंत्री संतोष कुमार सुमन ने कहा कि आज कुछ लोग सवर्ण समाज के हितों की बात कर रहे हैं।

लेकिन इतिहास गवाह है कि आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए आरक्षण की पहल करने वालों में उनके पिता और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी सबसे आगे रहे हैं।

सीएम पद से हटने के कारण लागू नहीं हुआ था फैसला 

संतोष सुमन ने अपने एक्स हैंडल पर इस बाबत लंबा पोस्ट किया है। लिखा है कि फरवरी 2015 में मुख्यमंत्री रहते हुए मांझी कैबिनेट ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव पारित किया था।

हालांकि कुछ ही दिनों बाद वे मुख्यमंत्री पद से हटा दिए गए और यह निर्णय लागू नहीं हो सका। बाद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का ऐतिहासिक निर्णय लेकर उसे पूरे देश में लागू किया।

उन्होंने कहा कि हम और जीतन राम मांझी की राजनीति किसी एक जाति या वर्ग तक सीमित नहीं रही है। हमारी राजनीति का केंद्र हर वर्ग का गरीब और वंचित व्यक्ति है। 

उन्होंने आगे लिखा, हमारा स्पष्ट मानना है कि गरीब की तकलीफ जाति देखकर नहीं आती। गरीबी अगड़े-पिछड़े, दलित-सवर्ण, हिंदू-मुस्लिम का भेद नहीं करती। इसलिए गरीबों के अधिकार और अवसर की लड़ाई भी किसी एक जाति तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा ने शुरू से ही संकीर्ण सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों से ऊपर उठकर गरीबों को केंद्र में रखने की राजनीति की है। 

सबको साथ लेकर चलने की राजनीति 

लेकिन आज जब हम दलित समाज के भीतर “कोटे में कोटा” और आरक्षण के लाभ की समीक्षा पर चर्चा की बात करते हैं, तो कुछ लोग इसका विरोध करते हुए कहते हैं कि समीक्षा तो दूर, इस विषय पर चर्चा तक नहीं होने देंगे।

हमारा सवाल केवल इतना है कि आखिर आरक्षण का लाभ समाज के सबसे गरीब, सबसे वंचित और अंतिम पायदान पर खड़े परिवारों तक व्यापक रूप से पहुंच रहा है या नहीं? क्या इस पर शांतिपूर्वक और सकारात्मक चर्चा भी नहीं हो सकती?

हम समाज को बांटने नहीं, सबको साथ लेकर चलने की राजनीति करते हैं। हम दबाव देखकर अपने नारे नहीं बदलते और न ही राजनीतिक समीकरण देखकर गरीबों की चिंता शुरू करते हैं।

जीतन राम मांझी जी ने मुख्यमंत्री रहते हुए आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की पहल करके यह स्पष्ट कर दिया था कि उनके लिए गरीब की पहचान उसकी जाति नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति है।