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बिहार की साहित्यिक विरासत संभालने वाली संस्था वेंटिलेटर पर, विद्यापति से दिनकर-रेणु तक की धरोहर पर संकट

Published: Thu, 29 Oct 2026 10:57 AM (IST)

बिहार की साहित्यिक अकादमियां, विशेषकर बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, कर्मचारियों की कमी, संसाधनों के अभाव और प्रकाशन ठप होने के ...और पढ़ें

बिहार हिंदी ग्रन्थ अकादमी परिसर में बाढ़ में बर्बाद पुस्तकें। lजागरण

बिहार हिंदी ग्रन्थ अकादमी परिसर में बाढ़ में बर्बाद पुस्तकें। lजागरण

HighLights

  1. अकादमियां कर्मचारियों की कमी और संसाधनों के अभाव से जूझ रही हैं।

  2. 2020 की बाढ़ में हजारों किताबें नष्ट, प्रकाशन भी बंद।

  3. स्थायी निदेशक नहीं, वेतन संकट और बुनियादी ढांचा खराब।

प्रभात रंजन, पटना। बिहार की साहित्यिक और भाषाई विरासत को सहेजने वाली अकादमियां खुद अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। विद्यापति, दिनकर, रेणु और नागार्जुन जैसे साहित्यकारों की धरती पर हिंदी, मैथिली, भोजपुरी, मगही, अंगिका और उर्दू जैसी भाषाओं के संवर्धन के लिए बनी संस्थाएं कर्मचारियों की कमी, संसाधनों के अभाव और प्रकाशन ठप होने जैसी समस्याओं से घिरी हैं।

बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी की स्थिति इसकी गंभीर तस्वीर पेश करती है। वर्ष 2020 की बाढ़ में हजारों किताबें बर्बाद हो गईं, जबकि पुस्तकों का प्रकाशन भी बंद है।

कभी साहित्यकारों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए अहम केंद्र रहीं ये संस्थाएं अब सरकारी उपेक्षा और बदहाल व्यवस्था के बीच अपनी पहचान बचाने की जद्दोजहद कर रही हैं।

34 कर्मचारियों से अब महज 8 के भरोसे संचालन

बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी की स्थापना 13 फरवरी 1970 को हुई थी। वर्ष 1985 में इसे अपना भवन मिला, जिसका उद्घाटन 19 नवंबर 1987 को किया गया था।

अकादमी के कर्मचारी वासुदेव पासवान के अनुसार, वर्ष 2008 तक यहां 34 कर्मचारी कार्यरत थे, लेकिन अब इनकी संख्या घटकर केवल आठ रह गई है। 2008 के बाद से कोई नई बहाली नहीं हुई। कर्मचारियों की कमी के कारण संस्थान का नियमित कामकाज प्रभावित हो रहा है।

2020 की बाढ़ में हजारों किताबें बर्बाद

पटना में वर्ष 2020 में आई बाढ़ के कारण अकादमी की हजारों पुस्तकें बर्बाद हो गईं। लंबे समय बाद भी इन किताबों की भरपाई नहीं हो सकी है।

अकादमी में प्रकाशित कई महत्वपूर्ण पुस्तकों की उपलब्धता भी प्रभावित हुई है। इनमें केके दत्ता की लिखी बिहार में स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास और दक्षिण बिहार की नदियां जैसी पुस्तकें शामिल हैं। पुस्तकें सुरक्षित रखने और उनके दोबारा प्रकाशन की चुनौती अब भी बनी हुई है।

2020 के बाद प्रकाशन बंद, बिक्री पर भी असर

अकादमी में वर्ष 2020 के बाद से पुस्तकों का प्रकाशन बंद बताया गया है। पहले पुस्तकों की नियमित बिक्री से संस्थान को आय होती थी और प्रतिमाह लाखों रुपये की पुस्तकों की बिक्री होने की बात कही गई है।

अब नई पुस्तकें प्रकाशित नहीं होने और पुरानी पुस्तकों की कमी के कारण दूसरे स्थानों से आने वाले ऑर्डर भी पूरे नहीं हो पा रहे हैं। इससे अकादमी की साहित्यिक गतिविधियों के साथ उसकी बिक्री व्यवस्था भी प्रभावित हुई है।

स्थायी निदेशक नहीं, प्रभार में चल रहा काम

अकादमी वर्ष 2005 से स्थायी निदेशक के बिना चल रही है। फिलहाल इसका संचालन प्रभार के आधार पर किया जा रहा है।

कर्मचारियों की कमी के बीच नेतृत्व का स्थायी इंतजाम नहीं होने से संस्थान के नियमित संचालन पर असर पड़ रहा है। अकादमी के भविष्य और प्रकाशन कार्य को फिर से शुरू करने के लिए स्थायी व्यवस्था की जरूरत महसूस की जा रही है।

कर्मचारियों के वेतन पर संकट, आर्थिक परेशानी

अकादमी में काम कर रहे कर्मचारियों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। खबर के अनुसार, कर्मचारियों को दशहरा से पहले से वेतन नहीं मिला है।

सीमित कर्मचारियों के भरोसे चल रहे संस्थान में वेतन का संकट कामकाज की मुश्किलों को और बढ़ा रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में संचालन के लिए भी पर्याप्त लोग नहीं बचेंगे।

धूल फांक रहीं किताबें, प्रचार गाड़ी भी बदहाल

अकादमी परिसर में पुस्तकें बिखरी पड़ी हैं और धूल खा रही हैं। पुस्तकों की बिक्री के लिए खरीदी गई प्रचार गाड़ी की हालत भी खराब बताई गई है।

भवन की दीवारें जगह-जगह से टूट रही हैं और रखरखाव के अभाव में परिसर की स्थिति बिगड़ रही है। अकादमी की वेबसाइट www.bhga.co.in भी बंद है, जिससे संस्थान की जानकारी और पुस्तकों तक ऑनलाइन पहुंच प्रभावित हो रही है।

भाषा और साहित्य की विरासत पर संकट

बिहार की विभिन्न भाषाओं और साहित्यिक परंपराओं को संरक्षित करने के उद्देश्य से बनी अकादमियां कभी लेखकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण केंद्र थीं। लेकिन कर्मचारियों की कमी, प्रकाशन बंद होने, किताबों के नष्ट होने और बुनियादी सुविधाओं के अभाव ने इनके कामकाज को कमजोर कर दिया है।

हिंदी ग्रंथ अकादमी की मौजूदा स्थिति इस सवाल को सामने लाती है कि बिहार की साहित्यिक विरासत को सहेजने वाली संस्थाओं को फिर से सक्रिय बनाने के लिए सरकार कब ठोस कदम उठाएगी।