उमर खान, बखरी (बेगूसराय)। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में बिहार ख़ासकर बेगूसराय के लिए 21 अप्रैल 1930 का दिन अपना विशेष महत्व रखता है। इसी दिन बिहार केसरी श्रीकृष्ण सिंह ने बखरी में नमक कानून को भंग कर अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती दी थी। नमक कानून तोड़े जाने के अपराध में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर बखरी स्थित डाक बंगला में नजरबंद कर दिया था। रात गुजरने के बाद अगली सुबह डाक बंगला में ही अंग्रेजों की कोर्ट लगी और भारत मां के वीर सपूत श्री बाबू को सजा सुनाकर उन्हें मुंगेर जेल भेज दिया गया।

दरअसल अंग्रेजों के अत्याचार और शोषण के विरुद्ध चल रहे असहयोग आंदोलन को 1922 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा अचानक स्थगित कर दिया गया। इससे देश में हर तरफ निराशा के भाव छा गए। देशव्यापी जनांदोलन के बंद होने से स्वतंत्रता संग्राम के समुद्र में थोड़े समय के लिए ठहराव सा आ गया। तब देश को स्वतंत्र कराने तथा स्वतंत्रता संघर्ष में नई जान और उर्जा भरने के लिए बापू ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को अपना नया हथियार बनाया।

अंग्रेजी हुकूमत को मात देने के लिए बापू ने नमक कानून को भंग करने के लिए संघर्ष की शुरुआत डांडी मार्च से की। इसके लिए गांधी जी ने साबरमती से डांडी यात्रा प्रारंभ की। नमक कानून तोड़ने के गांधी जी के आह्वान के बाद देश की राजनीतिक दशा और दिशा फिर से बदल गई। आजादी के मतवालों ने जगह जगह नमक कानून को भंग कर अंग्रजी हुकूमत की चुलें हिलाने में जुट गए।

बिहार में श्रीकृष्ण सिंह ने नमक कानून के खिलाफ सत्याग्रह छेड़ा। नमक कानून भंग करने के लिए बखरी के गढ़पुरा की दुर्ग गाछी का चयन किया गया। बताया जाता है कि यह इलाका उस समय उसर भूमि (नोनिया मिट्टी) से भरा था। यहां नमक बनाने के उपकरण के साथ सभी तैयारियां पूरी कर ली गई। केवल प्रदेश के जनप्रिय नेता श्री बाबू के आने का इंतजार था।

श्री बाबू ने कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने के लिए अपने विरोध की यात्रा तत्कालीन जिला मुख्यालय मुंगेर से प्रारंभ की। अंग्रेजी हुकूमत के विरोध का यह काफिला प्रशासन की नजरों से बचते बचाते 21 अप्रैल 1930 को दुर्ग गाछी पहुंच गया। गाछी में उनके द्वारा नमक बनाकर उक्त काले कानून को तोड़ा गया। मौके पर बखरी, गढ़पुरा समेत जिले भर के स्वतंत्रता प्रेमी इस पुनीत कार्य में उनके साथ थे।

नमक कानून के भंग होते ही अंग्रेज सरकार के सिपाहियों ने श्री बाबू को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद बखरी मुख्यालय में 1908 में निर्मित डाक बंगला में उन्हें लाया गया। गिरफ्तारी के बाद गढ़पुरा से बखरी लाने में चौकीदार कारी पासवान ने अपने जनप्रिय नेता का भरपूर ख्याल रखा, जबकि बखरी के झाबर मोटिया (नोनिया) ने रातभर उनकी भरपूर सेवा की और उनकी सभी जरुरतों को पूरा करते रहे। यही वजह थी कि आजादी मिलने तथा बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री बनने के बाद श्री बाबू जब भी बेगूसराय आए उन्होंने अपने विपत्ति काल के दोनों सहयोगियों को कभी भूले नहीं और हमेशा ही उन्हें अपने पास बुलाकर सम्मान देते रहे।

गिरफ्तारी की दूसरी सुबह बखरी के रेलवे ढाला चौक स्थित डाक बंगला में भारत माता की आजादी के मतवालों की सजा की मुकर्रर के लिए कोर्ट लगी। श्री बाबू को दोषी ठहराते हुए सजा मुकर्रर हुई और उन्हें गिरफ्तार कर मुंगेर जेल भेजा गया। बाद में उन्हें जमुई जेल स्थानांतरित कर दिया गया। भारतीय स्वतंत्रता इतिहास में जिले के लिए यह दिन महत्वपूर्ण बन गया। बिहार गौरव श्री बाबू की गिरफ्तारी तो हुई, लेकिन उसके दूरगामी परिणाम सामने आए। इसने प्रदेश के लोगों को एक नई स्फूर्ति तथा संघर्ष का बल दे गई।

Edited By: Shubh Narayan Pathak