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गंगा जल संधि पर केंद्र से मांग करेगा बिहार, 10 हजार क्यूसेक पानी की जरूरत; गाद प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय नीति पर जोर

Published: Thu, 29 Oct 2026 04:25 PM (IST)

बिहार सरकार गंगा जल संधि की भावी व्यवस्था में राज्य की जल जरूरतों और गाद प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय नीति ...और पढ़ें

गंगा में गाद जमाव से बाढ़ और जल उपलब्धता की चुनौती

गंगा में गाद जमाव से बाढ़ और जल उपलब्धता की चुनौती

HighLights

  1. गंगा जल संधि में बिहार की जल जरूरतों पर जोर।

  2. गैर-मानसून में 10 हजार क्यूसेक पानी की आवश्यकता।

  3. गाद प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय नीति की मांग।

राज्य ब्यूरो, पटना। बिहार सरकार गंगा जल संधि की भावी व्यवस्था में राज्य की जल जरूरतों को प्रमुखता से शामिल कराने के लिए केंद्र सरकार के समक्ष अपना पक्ष रखेगी। इस मुद्दे पर जल संसाधन विभाग की ओर से 30 अक्टूबर 2026 को पटना के होटल चाणक्या में सेमिनार आयोजित किया जाएगा।

इसमें गंगा जल संधि के तकनीकी और नीतिगत पहलुओं के साथ बिहार की वर्तमान और भविष्य की जल आवश्यकताओं पर चर्चा होगी।

भारत और बांग्लादेश के बीच 12 दिसंबर 1996 को 30 वर्षों के लिए गंगा जल संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। इसकी अवधि 11 दिसंबर 2026 को समाप्त हो रही है।

ऐसे में संधि की भावी व्यवस्था पर विचार करते समय बिहार की जरूरतों को शामिल करना महत्वपूर्ण है। राज्य सरकार इस विषय पर वैज्ञानिक तथ्यों और तकनीकी आकलन के आधार पर अपनी बात रखने की तैयारी कर रही है।

गैर-मानसून अवधि में 10 हजार क्यूसेक पानी की जरूरत

बिहार सरकार ने वर्ष 2051 तक राज्य की अनुमानित जल आवश्यकता का वैज्ञानिक आकलन कराया है। प्रारंभिक आकलन के अनुसार, जनवरी से मई तक गैर-मानसून अवधि में बिहार को न्यूनतम लगभग 10 हजार क्यूसेक पानी की जरूरत है।

राज्य में जलाशयों और अन्य जल स्रोतों में पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं होने से सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और औद्योगिक विकास प्रभावित हो सकते हैं।

गंगा में वर्षभर पर्याप्त जल की उपलब्धता बिहार की जल सुरक्षा के लिए अहम मानी जा रही है। भविष्य में कृषि, उद्योग, ऊर्जा, शहरी विकास और बढ़ती आबादी की जरूरतों के कारण पानी की मांग बढ़ने की संभावना है।

इसी आधार पर राज्य सरकार संधि की भावी व्यवस्था में बिहार की वर्तमान और भविष्य की आवश्यकताओं का समग्र आकलन शामिल कराने पर जोर देगी।

गंगा में गाद जमाव से बाढ़ और जल उपलब्धता की चुनौती

बिहार में गंगा और उत्तर बिहार की कई नदियां हिमालय से निकलती हैं और मानसून के दौरान बड़ी मात्रा में गाद लेकर आती हैं।

राज्य की कम ढाल वाली भौगोलिक संरचना के कारण नदी के प्रवाह की गति कम होने पर गाद तल में जमा होने लगती है। इससे नदी तल की ऊंचाई, पानी के प्रवाह और नदियों की जलवहन क्षमता पर असर पड़ सकता है।

गाद का जमाव केवल बाढ़ के खतरे तक सीमित नहीं है। इससे बराजों, जलाशयों और अन्य जल स्रोतों की जलधारण क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।

इसका असर सिंचाई और पेयजल आपूर्ति पर पड़ने की आशंका रहती है। इसी कारण सेमिनार में गाद प्रबंधन, बाढ़ जोखिम कम करने और जल की दीर्घकालिक उपलब्धता सुनिश्चित करने के उपायों पर विशेषज्ञों के साथ चर्चा होगी।

राष्ट्रीय गाद प्रबंधन नीति और कोष की मांग

बिहार सरकार ने गाद प्रबंधन और नदी तंत्र के पुनर्स्थापन की जरूरत को देखते हुए 'बिहार जलस्रोत पुनर्स्थापन एवं गाद प्रबंधन नीति, 2026' लागू की है।

राज्य का मानना है कि गंगा में गाद जमाव की समस्या अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय प्रकृति की है। इसलिए इसके समाधान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट नीति और दीर्घकालिक कार्ययोजना की जरूरत है।

इसके साथ ही गंगा बेसिन के राज्यों को तकनीकी और वित्तीय सहायता देने के लिए राष्ट्रीय कोष बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया जाएगा।

बाढ़ प्रबंधन की योजनाओं में गाद प्रबंधन, नदी तल के वैज्ञानिक अध्ययन और जरूरत के अनुसार ड्रेजिंग की संभावनाओं को शामिल करने पर विचार किया जाएगा।

बक्सर से फरक्का तक गाद के हवाई सर्वेक्षण पर भी नजर

बक्सर से फरक्का तक गंगा नदी में गाद जमाव की स्थिति का निर्धारित हवाई सर्वेक्षण स्थगित कर दिया गया है। नदी में गाद की मात्रा और उसके प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन बाढ़ प्रबंधन तथा जल प्रवाह की स्थिति समझने के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। सेमिनार में गाद प्रबंधन से जुड़े तकनीकी पहलुओं पर भी विचार-विमर्श किया जाएगा।

राज्य सरकार का जोर है कि नदी की स्थिति, जल की उपलब्धता और बाढ़ के जोखिम का आकलन वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर किया जाए। इससे जरूरत के अनुसार दीर्घकालिक योजनाएं बनाने में मदद मिल सकती है।

विशेषज्ञों के सुझावों के आधार पर केंद्र के सामने रखेगा पक्ष

सेमिनार में विशेषज्ञों से जल मांग के आकलन, जल के न्यायसंगत उपयोग, गाद प्रबंधन, बाढ़ जोखिम कम करने और जल की दीर्घकालिक उपलब्धता सुनिश्चित करने के व्यावहारिक विकल्पों पर सुझाव देने की अपेक्षा है।चर्चा में उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों, तकनीकी अध्ययनों और विशेषज्ञों के अनुभवों को आधार बनाया जाएगा।

विचार-विमर्श के बाद तकनीकी और नीतिगत अनुशंसाएं तैयार करने का प्रयास किया जाएगा। इनके जरिए बिहार की जल जरूरतों और गंगा जल संधि से जुड़े राज्य के हितों को भारत सरकार तथा संबंधित संस्थाओं के समक्ष तथ्यात्मक आधार पर प्रस्तुत किया जाएगा।