डॉ. सुशील कुमार सिंह। Bihar Chunav Results 2020 पिछले बार की तरह इस बार भी तमाम एक्जिट पोल को गलत साबित करते हुए नीतीश कुमार की अगुआई में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने बिहार विधानसभा के चुनावों में 125 सीटें हासिल कर बाजी मार ली है। दरअसल नीतीश कुमार बिहार में सुशासन लाने के लिए जाने जाते हैं और शायद उसी का परिणाम है कि प्रदेश की जनता तमाम नाराजगी और विपरीत हालात के बाद भी अपने दिल से उन्हें नहीं निकाल पाई। हालांकि इस बार नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड (जदयू) भाजपा से कम सीट हासिल कर पाई है।

बिहार का यह चुनाव लालू राज के कुशासन बनाम नीतीश राज के सुशासन : पिछले विधानसभा चुनाव में तीसरे नंबर पर रहने वाली भाजपा इस बार 74 सीटों के साथ दूसरे नंबर की पार्टी बन गई है। तेजस्वी यादव की राष्ट्रीय जनता दल (राजद) पिछली बार के 80 सीटों के मुकाबले इस बार 75 सीट ही जीत पाई है, फिर भी वह सबसे बड़ी पार्टी बनने में सफल रही है। वहीं जदयू ने पिछली बार 71 सीटों पर जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार मात्र 43 सीटों पर सिमटना इसके प्रति मतदाताओं की नाराजगी को भी साफ झलकाता है। बहरहाल, बिहार का यह चुनाव लालू राज के कुशासन बनाम नीतीश राज के सुशासन के बीच मुकाबले के रूप में भी जाना जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतीश से पहले के लालू-राबड़ी सत्ता की याद दिलाकर बिहार के मतदाताओं को जहां होशियार रहने पर जोर दिया, जंगलराज और कुशासन की बात कह कर राजद को बैकफुट पर धकेलने का प्रयास किया, वहीं नीतीश ने अपना अंतिम चुनाव कहकर मतदाताओं के बीच भावनात्मक कार्ड भी खेला।

इसमें कोई दुविधा नहीं कि अपने शासन काल में नीतीश कुमार ने बिहार को सुधार के साथ प्रगति भी दी है। यद्यपि सुशासन को लेकर आम लोगों में विभिन्न विचार हो सकते हैं, पर यही वह ताकत है जो मानवाधिकार, सहभागी विकास और लोकतंत्र के महत्व पर बल देती है। इसी के चलते नीतीश कुमार पिछले डेढ़ दशक में न्याय, सशक्तीकरण एवं क्षमतापूर्वक सेवाप्रदायन की भूमिका में बने रहे हैं। इस दौरान वे समाज के प्रत्येक तबके में गरीबी, बीमारी, शिक्षा, चिकित्सा समेत बुनियादी तत्वों को हल करते दिखे। बिजली, पानी, सड़क, सुरक्षा इत्यादि के चलते भी नीतीश के सुशासन को बिहार की जनता चुनावों में भूली नहीं।

कोरोना के इस काल में रोजगार की बड़ी मार : अलबत्ता तेजस्वी यादव ने युवाओं को 10 लाख सरकारी नौकरी देने की बात जरूर कही, मगर मतदाताओं ने उन पर इतना भरोसा नहीं किया। इसकी वजह पूर्व में लालू राज की कटु यादें हो सकती हैं। हालांकि बिहार कोरोना के इस काल में रोजगार की बड़ी मार ङोल रहा है। बावजूद इसके लोगों का पुरानी सत्ता पर भरोसे का बढ़ना यह बताता है कि राजद को लेकर मतदाताओं में अभी भी भय कायम है। वैसे लालू के शासनकाल की नकारात्मक यादों को प्रचार से दूर कर तेजस्वी ने स्वयं को अगुआ की भूमिका में रखा, मगर इसके बाद भी सत्ता तक न पहुंच पाए। देखा जाए तो इसमें केवल एक रुकावट नीतीश का सुशासन ही था।

केंद्र सरकार का भारी-भरकम आर्थिक पैकेज भी बिहारी मतदाताओं को रास आया : वैसे नीतीश कुमार को कुर्सी और तेजस्वी को मजबूत विपक्षी होने का गौरव देकर बिहार के मतदाताओं ने समझदारी भी दिखाई है। तेजस्वी कम उम्र के हैं और प्रखर हैं। वे बेहतर विपक्ष की अच्छी भूमिका निभा सकेंगे। वहीं नीतीश अनुभवी हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि इसकी बदौलत वे अपनी अंतिम पारी में प्रदेश को विकसित राज्य की श्रेणी में ला खड़ा करेंगे। इस दौरान तेजस्वी को भी उनसे काफी कुछ सीखने को मिलेगा, जिसका फायदा उन्हें बाद में कभी सत्ता में आने पर मिल सकेगा। जिस तर्ज पर नीतीश की ताजपोशी हो रही है, अब बिहार के मतदाताओं के लिए कोई कमी सरकार की ओर से नहीं होनी चाहिए। चुनाव से पहले केंद्र सरकार का भारी-भरकम आर्थिक पैकेज भी बिहारी मतदाताओं को रास आया है। मगर एक कयास यह भी है कि जदयू की सीटों की संख्या कम होने से यदि भाजपा के मन में कोई नया अंकुर फूटता है, तो यह मतदाताओं के साथ किसी अनहोनी से कम नहीं होगी। बेशक नीतीश के दल को कम सीटे आई हों, मगर यह जीत नीतीश की ही कही जाएगी। युवाओं, महिलाओं, बुजुर्गो ने नीतीश के चेहरे पर ही मत दिया है।

बिहार विधानसभा का यह चुनाव जिस दौर में हुआ है, वह न्यू बिहार का भी परिप्रेक्ष्य लिए हुए है। देश के लिए यह चुनाव एक उदाहरण है। यह इस बात के लिए भी जाना जाएगा कि भले ही कोरोना संकट में सरकारों ने जनता का उतना साथ न दिया हो, मगर यदि उनकी उपलब्धि पुरानी हो, तो जनता का विश्वास टूटता नहीं है। वास्तव में कोरोना काल में बिहार के प्रवासियों को नीतीश की सरकार वे जहां थे उन्हें वहीं रहने की सलाह दे रही थी और बाद में भी उनके लिए खास बंदोबस्त नहीं कर पाई थी। इससे लगा था कि चुनाव में मतदाताओं का गुस्सा उन पर फूटेगा, पर सुशासन की महत्ता और अपनी सुरक्षा को देखते हुए राज्य के मतदाताओं ने नीतीश कुमार को चुनना ही बेहतर समझा।

हालांकि तेजस्वी यादव के प्रयासों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। उन्होंने लालू राज की गलतियों पर माफी भी मांगी, आलोचनाओं पर सधा हुआ जवाब भी दिया। एक कम उम्र का परिपक्व नेता दिखाने का प्रयास किया, पर जीत से दूरी बनी रही। कुल मिलाकर आगामी पांच साल यह तय करेंगे कि नीतीश कुमार अपनी सुशासन की नीति को और कितनी धार देते हैं व बिहार की जनता को कैसे आत्मनिर्भर बनाते हैं। अगर इस कार्यकाल में वे बेरोजगारी की समस्या को दूर कर सके तो वह अपने पीछे एक बड़ी विरासत छोड़ जाएंगे। यह संभव हो सका तो नीतीश कुमार को बिहार का सुधारक भी कहा जा सकेगा और विपक्षी की भूमिका में तेजस्वी यदि खरे उतरे और लोगों का भरोसा हासिल कर सके तो अगली बार मतदाता उनकी पार्टी को बहुमत भी दे सकती है।

[निदेशक, वाईएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन]

Edited By: Sanjay Pokhriyal