पटना, जेएनएन। पटना प्रमंडल में विधानसभा चुनाव को लेकर प्रत्याशियों का गुणा-भाग शुरू हो चुका है। जिन्हें अपनी दावेदारी सुरक्षित लग रही वे तो इलाके में वर्चुअल कार्यक्रम में आ रहे पार्टी के बड़े नेताओं के स्वागत-सत्कार में लगे ही हैं, संभावित भी सेटिंग-गेटिंग में एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं। शहर और गांव-गिरांव मतदाताओं ने भी पार्टी और नेताओं का मिजाज भांपना शुरू कर दिया है। कोरोना काल की वजह से पान-चाय की दुकानों में चुनावी चर्चा के लिए जमघट तो नहीं लग रहा, लेकिन घर, पास-पड़ोस और राह चलते लोग विधायकों के क्रियाकलापों पर बहस कर रहे हैं। जातीय समीकरण से लेकर रोजी-रोजगार, खेती, बाढ़, अपराध और सरकारी योजनाओं की सुस्त मुद्दों पर चर्चा में शामिल है। कार्यकर्ताओं के साथ आम-अवाम को भी टिकटों की टिकटिक और अधिसूचना के रूप में आधिकारिक चुनावी डुगडुगी बजने का इंतजार है। सियासी तापमान कुछ इस प्रकार हिलोरें ले रहा है-

चौदह सीटों वाले पटना जिले में गतिविधि तेज

पटना जिले में चौदह विधानसभा क्षेत्र हैं। संसदीय क्षेत्र के लिहाज से पाटलिपुत्र और पटना साहिब के साथ ही मुंगेर का एक बड़ा हिस्सा पटना का अंग है। पाटलिपुत्र संसदीय क्षेत्र में दानापुर, मनेर, फुलवारी, मसौढ़ी, पालीगंज और विक्रम विधानसभा क्षेत्र आता है। इनमें फुलवारी और मसौढ़ी सुरक्षित है। पटना साहिब संसदीय क्षेत्र में बख्तियारपुर, दीघा, बांकीपुर, कुम्हरार, पटना साहिब और फतुहा विस सीटें आती है। फतुहा सुरक्षित क्षेत्र है। मुंगेर संसदीय क्षेत्र का मोकामा और बाढ़ विधानसभा क्षेत्र भी पटना की परिधि में है। दानापुर में भाजपा ने दबदबा बनाए रखा है। फुलवारीशरीफ से लगातार जीतने वाले श्याम रजक इस बार जदयू छोड़ राजद में आ गए हैं। मनेर सीट राजद के पास रहती है। पालीगंज में लड़ाई भाजपा और राजद में ठनती है। बिक्रम में भाजपा-जदयू की टूट का फायदा 2015 में कांग्रेस को मिल गया। इस बार स्थिति बदल सकती है। मुद्दों पर गौर करें तो शहरी क्षेत्र में जहां जलजमाव की समस्या सताती है, तो पाटलिपुत्र संसदीय इलाके में पुनपुन, सोन और गंगा के जलस्तर में वृद्धि हर साल परेशान करती है। ग्रामीण क्षेत्र में सिंचाई के साधन के लिए भी ठोस पहल का इंतजार है। रोजगार, शिक्षा जैसे मुद्दे भी उठेंगे।

रोहतास में उलटफेर की स्थिति

रोहतास जिले के सात विधानसभा क्षेत्र में इस बार मुकाबला गठबंधनों के बदलने से दिलचस्प होने के आसार हैं। चुनावी समर में अधिकांश चेहरे पुराने दिख रहे हैं, लेकिन सुर बदले हैं। धान के कटोरा में किसानों की समस्या पर चर्चा शुरू है। सात विधानसभा सीटों में 2015 में राजद को चार, जदयू दो व रालोसपा का एक पर कब्जा था। अब सासाराम के राजद विधायक जदयू का दामन थाम चुके हैं। वहीं, रालोसपा से चेनारी विधायक भी जदयू में आ गए हैं। नए गठबंधन में कौन सी सीट किसके हाथ में जाएगी, इसे ले असमंजस है। मुद्दों में प्रवासी मजदूरों को रोजगार नहीं मिलने की शिकायत है। साढ़े चार वर्ष पूर्व सोन नदी पर इंद्रपुरी बराज बनाने की कवायद भी सुस्त है। 

भोजपुर में लड़ाई दिलचस्प 

भोजपुर जिले में अगिआंव सुरक्षित समेत सात विधानसभा क्षेत्र हैं। तरारी में भाकपा माले और अगिआंव सीट पर जदयू का कब्जा है। अन्य पांच सीटें राजद के पास हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार चुनाव दिलचस्प होगा। 2015 में राजग ने सातों सीटों पर चुनाव लड़ा। तरारी एवं जगदीशपुर लोजपा व रालोसपा को को मिलीं थीं, अन्य पांच सीटों पर भाजपा प्रत्याशी थे। राजग को सभी सीटों पर पराजय का मुंह देखना पड़ा था। बदले समीकरण में इस बार सभी सीटों पर पूरे दमखम के साथ भाजपा दावा ठोक रही है। चर्चा है कि सात सीटों मेें भाजपा और जदयू तीन-तीन पर लड़ेंगे तथा एक सीट लोजपा को मिलेगी। 

बक्सर में दिख रहा पुराना परिदृश्य

बिहार व उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित बक्सर धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। यहां मुगलों का दंभ शेरशाह ने चूर किया था, तो 1764 में यहीं से अंग्रेजों ने तीन भारतीय शासकों की सम्मिलित सेना को हराकर भारत में अंग्रेजी हुकूमत की नींव रखी थी। त्रेतायुग में भगवान राम ने यहीं ताड़का का वध किया था। विधानसभा और लोकसभा को मिलाकर पिछले चार चुनावों का ट्रेंड यहां की राजनीति धारा स्पष्ट करता है। दरअसल, बक्सर के चारों विधानसभा की तस्वीर गठबंधन की राजनीति से तय होती है। जिले में चार विधानसभा क्षेत्र हैं। इनमें ब्रह्मपुर, बक्सर और डुमरांव सामान्य, जबकि राजपुर सुरक्षित सीट है। 2010 के चुनाव में जदयू के साथ रहते चारों सीटों पर राजग का झंडा बुलंद हुआ। वहीं, 2015 में जदयू राजग का हिस्सा नहीं रहा और तस्वीर बदल गई। इस चुनाव में राजग को जिले में एक सीट भी हासिल नहीं हुई, जबकि जदयू के खाते में राजपुर और डुमरांव सीट गए। वहीं, एक सीट बक्सर में कांग्रेस और ब्रह्मपुर पर राजद को जीत मिली।

इस बार जदयू की एनडीए में वापसी हो चुकी है तो समीकरण 2010 के चुनाव जैसे हैं। लोकसभा चुनाव में ट्रेलर भी दिखा, जब भाजपा प्रत्याशी ने चारों विधानसभा क्षेत्रों में अच्छे मार्जिन से बढ़त ली। हालांकि, इस बार अब तक राजग और महागठबंधन में सीटों का बंटवारा नहीं हुआ है। डुमरांव और राजपुर से अभी जदयू के विधायक हैं। वहीं, 2010 के सीट बंटवारे के अनुसार बक्सर और ब्रह्मपुर पर भाजपा की दावेदारी है। लोजपा भी जिले से एक सीट के लिए दबाव दे रही है। महागठबंधन में भी सीट बंटवारे को लेकर खींचतान कम नहीं है। फिलहाल, ब्रह्मपुर में राजद और बक्सर सदर सीट पर कांग्रेस काबिज है। राजग में रहते हुए रालोसपा ने 2015 में डुमरांव से भाग्य आजमाया था। इस बार भी यहां से वह अपनी भागीदारी चाह रही है। 

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