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पटना, जेएनएन।  देश में जहां असहिष्णुता को लेकर बहस जारी है और आए दिन कई घटनाएं देखने को मिलती हैं तो वहीं नालंदा जिला में एक गांव है माड़ी, जो सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बना हुआ है। इस गांव में दंगों की वजह से मुसलमानों के पलायन करने के बाद भी करीब 200 साल पुरानी मस्जिद अब भी गांव की धरोहर बनी हुई है।

इस मस्जिद की हिंदू समाज के लोग सुबह-शाम साफ-सफाई करते हैं और यहां प्रतिदिन पांचों वक्त की नमाज की आवाज गूंजती है। हर साल ईद पर मस्जिद का रंग-रोगन भी किया जाता है, ये पता ही नहीं चलता कि इस गांव में मुस्लिमों की आबादी नहीं रहती।

गांव वासी बताते हैं कि वर्षों पूर्व यहां मुस्लिम परिवार रहते थे, परंतु धीरे-धीरे उनका पलायन हो गया और इस गांव में अब एक भी मुस्लिम परिवार नहीं रहता, लेकिन उनकी मस्जिद है, जिसकी हम अपने मंदिरों की तरह ही देख-रेख करते हैं।

गांव वालों का कहना है कि यह मस्जिद उनकी आस्था से जुड़ी हुई है। हम हिंदुओं को अजान तो आती नहीं है, परंतु पेन ड्राईव की मदद से अजान की रस्म अदा की जाती है। किसी शुभ कार्य से पहले हिंदू परिवार के लोग इस मस्जिद में आकर दर्शन करते हैं।

मस्जिद में नियम के मुताबिक सुबह और शाम सफाई की जाती है, जिसका दायित्व यहीं के लोग निभाते हैं। गांव में कभी भी किसी परिवार के घर अशुभ होता है तब वह परिवार मजार की ओर ही दुआ मांगने पहुंचता है।

200 पुराना है इतिहास

ग्रामीण शिवचरण बिन्द ने बताया कि मस्जिद का निर्माण बिहारशरीफ स्थित सदरे आलम स्कूल के निदेशक खालिद आलम के दादा बदरे आलम ने 200 वर्ष पहले कराया था। माड़ी गांव में 1981 से पहले अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक समाज के लोग मिल-जुलकर साथ रहते थे। लेकिन 1981 में हुए दंगा के बाद मुस्लिम परिवार इस गांव से पलायन कर गए। इसके बाद से इस गांव में बहुसंख्यक समाज के ग्रामीण रह रहे हैं और गांव में बनी मस्जिद की देखभाल कर रहे हैं।

रिकार्डिंग के माध्यम से दी जाती है अजान

गांव के ही संजय पासवान ने बताया कि गांव में मंदिर होने के बाद भी हिदू समाज के लोग मस्जिद को गांव की अनमोल धरोहर मानते हैं। चिप में अजान की रिकॉडिग रखते है। उन्होंने बताया कि उन्हें अजान के बारे में कोई जानकारी नहीं है। बस समय का पता रहता है । इसके लिए एक चिप की व्यवस्था की गई है जिसे मशीन में लगा कर निर्धारित समय पर अजान दिया जाता है।

मंडी से नाम पड़ा माड़ी

खालिद आलम ने बताया कि पहले इस गांव का नाम मंडी था। यह जिले में एक बाजार के रूप में स्थापित था। बाद में इसका नाम माड़ी पड़ा। लेकिन गांव में बार-बार बाढ़ व आग लगने से हुई तबाही के बाद इसका नाम बदलता चला गया। पहली तबाही के बाद इसका नाम नीम माड़ी पड़ा, फिर पाव माड़ी, इसके बाद मुशारकत माड़ी और अंत में इस्माइलपुर माड़ी।

 हजरत इस्माइल रह. के बाद बंद हुई तबाही

 खालिद आलम ने बताया कि हजरत इस्माइल रह. के दौर में गांव काफी खुशहाल हो चुका था। वह करीब 5 से 6 सौ साल पहले गांव में आए थे। उनके आने के बाद गांव में कभी तबाही नहीं आई। शादी के बाद लोग सबसे पहले हजरत के अस्ताने पर जाकर सलाम पेश करते है। आज ये मस्जिद व हजरत का अस्ताना गांव की धरोहर बन चुकी है। यही वजह है कि इस गांव में आज भी इंसानियत जिंदा है।

Posted By: Kajal Kumari

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