भुवनेश्वर वात्स्यायन, पटना। सूक्ष्म एवं लघु उद्योग क्षेत्र की खासियत यह है कि यह आर्थिक विकास को गति तो प्रदान करता ही है साथ ही साथ इस श्रेणी के जो उद्योग हैं वे स्वरोजगार को बढ़ावा देने में भी सक्षम हैं। राज्य सरकार की ओर से मुख्यमंत्री सूक्ष्म एवं लघु उद्योग क्लस्टर विकास योजना के माध्यम से इस सेक्टर में राज्य सरकार काम कर रही है। इस सेक्टर के तहत उद्यमियों के लिए किसी तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं व क्या प्राविधान हैं। 

बिहार में सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों को आगे बढ़ाने के लिए क्लस्टर विकास योजना के तहत सामान्य सुविधा केंद्र (सीएफसी) पर राज्य सरकार तथा क्लस्टर का अंशदान 90 प्रतिशत (अधिकतम 10 करोड़) एवं 10 प्रतिशत निर्धारित है। विशेष परिस्थिति में यदि क्लस्टर के सभी सदस्य गरीबी रेखा से नीचे के हों तो राज्य सरकार का अंशदान 100 प्रतिशत तक किए जाने का प्राविधान है।

सूक्ष्म एवं लघु उद्योग के क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों पर अधिक जोर

सूक्ष्म एवं लघु उद्योग के क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों का विशेष महत्व है। इस क्षेत्र में प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन चल रही है। पूर्व में कृषि विभाग के माध्यम से इस सेक्टर की योजनाओं का क्रियान्वयन होता था। अब उद्योग विभाग की देखरेख में सूक्ष्म एवं लघु उद्योग श्रेणी में खाद्य एवं प्रसंस्करण उद्योगों के लिए काम हो रहा है।  

अब तक इन क्लस्टरों की स्थापना के तहत काम आगे बढ़ा

1. राइस मिल क्लस्टर- लखीसराय

2. सीप बटन क्लस्टर-मेनमेहसी

3. बथना सीप बटन क्लस्टर- पूर्वी चंपारण

4. सिलाव खाजा क्लस्टर- नालंदा

5. कन्हैयागंज झूला क्लस्टर- नालंदा

6. कांसा-पीतल क्लस्टर- वैशाली एवं पश्चिम चंपारण

इन क्लस्टरों में वाणिज्यिक उत्पादन आरंभ

1.सीप बटन- मेनमेहसी

2. सीप बटन- मोतिहारी 

3. राइस मिल- लखीसराय

इन्क्यूबेेशन सेंटर

प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना के अंतर्गत एक जिला एक उत्पाद आधारित इन्क्यूबेशन सेंटर एक महत्वपूर्ण तत्व है। इसके अंतर्गत सूक्ष्म उद्योगों, स्वयं सहायता समूह, एफपीओ, सहकारी संस्थाएं सुविधा ले सकेंगे। इसके तहत एक जिला एक उत्पाद एवं अन्य उत्पाद के लिए इन्क्यूबेशन सेंटर की स्थापना में सहायता प्रदान की जाती है। इन्क्यूबेशन सेंटर का व्यावसायिक उपयोग किया जाना है। लाभार्थी को कौशल ढांचा के अनुरूप प्रशिक्षण दिया जाना है। इस योजना के तहत सहकारी संस्था के लिए 100 प्रतिशत निधि वहन करने की योजना है। निजी संस्था को 50 प्रतिशत तथा अनुसूचित जाति के लिए 60 प्रतिशत की मदद दी जाएगी। 

ब्रांडिंग एवं विपणन में भी सहायता

सूक्ष्म एवं लघु उद्योग के तहत स्थापित इकाईयों के उत्पादों की ब्रांडिंग एवं विपणन में भी सहायता दिए जाने का प्राविधान है। विपणन संबंधी ट्रेनिंग के लिए पूरी आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी जाएगी। मानकीकरण सहित साझा ब्रांड और पैकेजिंग को विकसित किया जाएगा। इसकी पात्रता यह है कि संबंधित उत्पाद वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट से जुड़े हों। सहायता का पात्र बनने के लिए उत्पाद का न्यूनतम टर्नओवर पांच करोड़ रुपए का होना चाहिए। अंतिम उत्पाद वह होना चाहिए जो रिटेल पैक में उपभोक्ताओं को बेचा जाए। ब्रांडिंग और विपणन के अंतर्गत आर्थिक सहायता हासिल करने को ले आवेदन की प्रक्रिया यह है कि संबंधित संस्था द्वारा उसका डीपीआर तैयार कराया जाएगा। उसमें परियोजना, उत्पाद, रणनीति, गुणवत्ता नियंत्रण, पैकेजिंग, मूल्य निर्धारण नीति, स्टोरेज, विपणन माध्यम व बिक्री में वृद्धि से संबंधित योजनाओं का ब्योरा देना है। विपणन और ब्रांडिंग के लिए प्रस्तावों के लिए पांच लाख रुपए की आर्थिक सहायता उपलब्ध होगी।

निजी सूक्ष्म उद्योगों को 35 प्रतिशत की दर से क्रेडिट लिंक्ड पूंजी सब्सिडी

सूक्ष्म एवं लघु उद्योग श्रेणी के तहत स्थापित होने वाले खाद्य प्रसंस्करण इकाईयों को परियोजना लागत के 35 प्रतिशत की दर से क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी है। यह अधिकतम दस लाख रुपए है। इसके साथ शर्त यह है कि संबंधित प्रोजेक्ट में लाभार्थी का न्यूनतम योगदान 10 प्रतिशत होना चाहिए। भूमि की लागत को परियोजना लागत में शामिल नहीं करना है। वर्कशेड का पट्टïा किराया परियोजना लागत में शामिल होगा जो अधिकतम तीन वर्षों के लिए हो।

इस क्षेत्र के उद्यमियों के लिए फैसिलिटेशन कांउसिल

सूक्ष्म एवं लघु क्षेत्र के उद्यमियों की सहायता के लिए राज्य सरकार के अधीन उद्योग निदेशक की अध्यक्षता में फैसिलिटेशन कांउसिल गठित है। इसके माध्यम से आपूर्तिकर्ता इकाईयों के लंबित दावों के भुगतान पर सुनवाई होती है। अद्यतन रिपोर्ट के अनुसार कांउसिल के समक्ष आए 62 मामलों में से 40 मामलों का निष्पादन किया जा चुका है।

Edited By: Akshay Pandey