पटना में कचरे से कमाई का अनोखा मॉडल, थर्मोकोल के दानों का हर महीने 17.50 लाख का कारोबार
पटना के खुसरूपुर स्थित अलावलपुर पंचायत में ब्रदर प्लास्टिक्स थर्मोकोल कचरे को दानों में बदलकर हर महीने लाखों की कमाई और रोजगार पैदा कर रहा है।

थर्मोकोल से तैयार दाने और कारखाने में चल रहा काम। सौ-विभाग
HighLights
थर्मोकोल कचरे से हर महीने लाखों की कमाई।
स्थानीय स्तर पर 12 लोगों को मिला प्रत्यक्ष रोजगार।
स्वच्छ भारत मिशन की पहल पर सफल मॉडल।
डिजिटल डेस्क, पटना। जिस थर्मोकोल कचरे का निस्तारण अपशिष्ट प्रसंस्करण इकाइयों के लिए चुनौती था, वही अब कमाई और रोजगार का जरिया बन गया है।
पटना जिले के खुशरूपुर प्रखंड की अलावलपुर पंचायत में ब्रदर प्लास्टिक्स हर महीने 40 से 50 टन थर्मोकोल दाने तैयार कर रहा है।
औसतन 35 हजार रुपये प्रति टन की दर से इनकी मासिक बाजार कीमत करीब 17.50 लाख रुपये है। इस काम से स्थानीय स्तर पर 12 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिला है।
लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान और स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की पहल से शुरू हुआ यह मॉडल अब बिहार से निकलकर झारखंड और उत्तर प्रदेश तक पहुंच गया है। इकाई पटना के आठ, रांची के दो और बनारस के एक कबाड़ी से थर्मोकोल कचरा खरीद रही है।
2017 में शुरू हुआ काम, 2023 से बनने लगे दाने
ब्रदर प्लास्टिक्स के संचालक दीपक कुमार ने वर्ष 2017 में कचरा केंद्रों से थर्मोकोल खरीदकर लम्प्स यानी ठोस टुकड़े तैयार करना शुरू किया था।
वर्ष 2023 से आधुनिक मशीनों की मदद से सीधे थर्मोकोल दाने (ग्रैन्यूल्स) बनाने का काम शुरू हुआ। थर्मोकोल हल्का होने के बावजूद अधिक जगह घेरता है।
खरीदार नहीं मिलने से इसके भंडारण और निस्तारण में भी परेशानी होती थी। इस समस्या के समाधान के लिए स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की प्रखंड क्रियान्वयन समिति ने स्थानीय कबाड़ व्यवसायी को इसके संग्रहण और पुनर्चक्रण के लिए प्रोत्साहित किया।
कचरे से ऐसे बनते हैं दाने
इकाई में थर्मोकोल को छोटे टुकड़ों में तोड़कर पिघलाया जाता है, जिससे ठोस लम्प्स बनते हैं। इन्हें ग्राइंडिंग मशीन से पाउडर में बदलकर आवश्यकतानुसार रसायन मिलाए जाते हैं।
इसके बाद एक्सट्रूडर मशीन से मोटे रेशे तैयार कर छोटे-छोटे दानों में काटा जाता है। इनका इस्तेमाल नई थर्मोकोल शीट बनाने में होता है।
कचरे से संपदा बनाने पर जोर
ग्रामीण विकास एवं सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के मंत्री श्रवण कुमार के अनुसार, लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत प्लास्टिक अपशिष्ट से पेवर ब्लॉक, गमले, खिलौने, सजावटी सामग्री और इंटरलॉकिंग टाइल्स बनाने के साथ सड़क निर्माण में भी इसका उपयोग किया जा रहा है।
सिंगल यूज प्लास्टिक से बेंच बनाने जैसे प्रयोग भी किए जा रहे हैं। मंत्री ने कहा कि विभागीय प्रयासों और उद्यमों के सहयोग से बिहार अपशिष्ट को संसाधन और संपदा में बदलने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
अलावलपुर की इकाई इसका उदाहरण है, जहां कचरे के पुनर्चक्रण से पर्यावरण संरक्षण के साथ रोजगार के अवसर भी पैदा हो रहे हैं।
