नगर प्रतिनिधि, पटना : कला संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित लोकोत्सव के अंतर्गत लोकगाथा उत्सव में मंगलवार को प्रेमचंद रंगशाला में 'सती बिहुला' की प्रस्तुति की गई। इसकी प्रस्तुति छपरा से आए शिव जी और उनके दल ने कर दर्शकों को रोमांचित कर दिया। खासतौर पर दलित जातियों में प्रचलित यह लोकगाथा अब अपनी जातीय सीमाओं से परे पूरे बिहार में पसंद की जाती है। यह कहानी सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं के समर्पण और महत्व को रेखांकित करती है।

बिहुला लक्ष्मीपुर के राजा की बेटी थी। उसकी शादी बाला लखन्दर से होती है वह अपने ससुराल नेवला, बिल्ली, गरुड़ के साथ पहुंचती है। लेकिन तमाम सावधानी के बावजूद तांत्रिक लखंदर को सांप से डंसवाने में कामयाब हो जाता है और लखंदर की मौत हो जाती है। (तांत्रिक का बाला लखंदर के पिता से दुश्मनी होती है वह उसके छह भाई को मार चुका है।) लखंदर के परिवार में शोक की लहर दौड़ जाती है और पूरा परिवार बिहुला को ही अपशकुन मानता है। बिहुला अपने पति का शव लेकर गंगा में कूद जाती है। गंगा में ही उसी मुलाकात इंद्र के धोबन से होती है। वह उसे मौसी का रिश्ता बना इंद्रलोक पहुंच जाती है। एक दिन धोये कपड़े की चमक से इंद्र को खुश कर देती है। इस पर इंद्र बिहुला को दरबार बुलाते हैं। बिहुला दरबार पहुंचती है और अप्सराओं के नृत्य पर टिप्पणी करती है। इंद्र उसे नृत्य का अवसर देते हैं और बिहुला के नृत्य से खुश होकर उसे वरदान मांगने को कहते हैं। बिहुला अपने पति और उसके भाइयों को जीवित करने का वरदान मांगती है। इसमें अशरफी पासवान, बिरजा, ब्रहमदेव पासवान, नागदेव राम, दशरथ राम, नठाली राम आदि ने अभिनय किया है। इसका संयोजन विनोद अनुपम ने किया।

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